हिंदी अपने देश की, आन बान है शान।
हिंद देश के वासियों, हिंदी से पहचान।
हिंदी से पहचान, शहद-सी है जो बोली।
राजभाषा अपनी , हिंदी बनी हमजोली।
सुंदर सरल हिंदी, माँ भारती की बिंदी।
मृदु व सरला भाषा, है अपनी मधुर हिंदी।
तू मीरा के गीत में, तू ही रस की खान।
'मानस' के हर छंद में, तू ही फूँके प्राण।
तू ही फूँके प्राण, 'पद्मावत' जायसी की।
तू 'निर्मला', 'प्रेमा', 'अप्सरा' तू 'रश्मिरथी'।
सुरम्या तू सुप्रिय, गर्वित है हिन्द की भू।
ब्रज, अवधी या खड़ी, हिंदी है सर्वत्र तू।
बोलो हिंदी गर्व से, करो नहीं संकोच।
निज भाषा बोलने में, इतना तू मत सोच।
इतना तू मत सोच, दिया कितना कुछ माँ ने।
पर तुम समझे नहीं, निज को मारते ताने।
अपनी जड़ से जुड़ो, औरों से नहीं तोलो।
गर्व करो हिन्द पर, गर्व से हिंदी बोलो।-
मासी ज्येष्ठ कि तपन से,संतापित सब जीव।
सूखे सरवर,कूप,सब,,,,मेघ बरस संजीव।।
मेघ बरस संजीव,,,कि हो सुख पारावारा।
कृषि फ़ले धन्य धान्य,नयनों को हर्ष अपारा।।
भू-अंबर की मैत्री,अचंभित तिहुँ जगवासी ।
क्रमशः हो अवरोही,दिशा-दिशा हो सावन मासी।।-
वृंदावन की राह को, नित देखे मन मोर,
कौनो जादू कर गयो, मोहन माखन चोर।
मोहन माखन चोर, निहारे ते मम नैना,
दरश दो घनश्याम, व्याकुल चित्त दिन-रैना।
हे माधव, गोपाल, तव ब्रजधाम अति पावन,
सही न जाए देर, बुला लो अब वृंदावन।-
*कुंडलियाँ छंद अभ्यास*
गर्मी की छुट्टी हुई, लेकिन हम मजबूर।
बंद पड़ा सारा शहर, गाँव बहुत है दूर।
गाँव बहुत है दूर, कहां चलती है रेलें।
बीत रहा अब साल, मुसीबत कितनी झेलें।
धूप बदल कर रंग, दिखाती थोड़ी नरमी।
जेठ मास की धूप, तनिक फीकी है गर्मी।
प्रीति-
कुंडलिया छंद
"माखन-चोरी करत है, मइया तेरो लाल।
गोपी देइ उलाहना, मुस्काये नंदलाल ।।
मुस्काये नंदलाल, मातु जब लकुटि उठायी।
अँसुवन नैना लाइ, कहें तब कृष्ण कन्हाई।।
'मधुमयि' रिस न करहु, सुनहु ओ मइया मोरी ।
ढीठ गोपिका झूठ, लगावे माखन चोरी ।।"-
विषय- प्रतीक्षा। विधा- कुण्डलिया
-----------------------------------------
प्रतीक्षा की राह में, पागल होते लोग।
पड़े हुए होकर बेसुध , जैसे छाया रोग।
जैसे छाया रोग, भाए नहि खाना पीना
रह रह मन सकुचात, होत है मुश्किल जीना।
कहता है, 'गुस्ताख़', वक़्त देता है दीक्षा।
लाये सुखद रिजल्ट, आती है फिर प्रतीक्षा।
-
कुंडलिया छंद
जनकसुता से मिल गए, जब राघव के नैन।
मन की कलियाँ खिल गईं, निकसत नाहीं बैन।।
निकसत नाहीं बैन, छबि बस गई उर अंतर
कल न परत दिन रैन, चलौ है जादू मंतर
जे बिलक्षणी प्रीत, चलि आई है प्रथा ते
बिछड़े राघव धीर, मिले हैं जनकसुता से-
आशा मम अखण्ड अतः, खंडित हर अभिमान।
आह्लादित मम मन भया, राम बसे निज धाम।
राम बसे निज धाम, प्रमुदित सकल संसारा।
वसुधापूजन साथ, शोभित नगर हर द्वारा।
अवधपुरी रग चारु, रघुकुल मणि राम वासा।
सत्पथ के प्रतिमान, दुखिया के राम आशा।-