बढ़े चलो...
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जब प्रेम की
पवित्रता और
विश्वास की
पराकाष्ठा के लिए
उपमान की बात हुई
तो भगवान ने
दो रिश्ते बनाये
एक माँ
जिसकी ममता
अनंत है।
और
एक बहन
जिसका निःस्वार्थ प्रेम
असीम है।-
हमको नहीं मंजूर तुमसे दूरियाँ हों।
इश्क़ में ना फिर यहाँ दस्तूरियाँ हों।
हम कभी भी रह रहे हों बिन तेरे,
बीच में ऐसी भी ना मजबूरियाँ हों।
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आओ कभी मिलूँगा, राहें निहारता हूँ।
नाराज़ हो अभी भी, मैं हीर हारता हूँ ।।
थामो मुझे भँवर में, पूरा न डूब जाऊँ।
मुझको गले लगा लो, सर्वस्व मैं समाऊँ।।
पूरे न हो रहे हैं, अरमान कुछ अधूरे।
पीना न चाहता हूँ, पीसे हुए धतूरे।।
सब राज खुल रहे हैं, क्यों और मैं छुपाऊँ।
कोरा रहा है कागज, क्या चाहते दिखाऊँ ?
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शाम सुहानी, दमक उठी थी चाँदनी।
आयी पनघट, गागर भरने यौवनी।।
शोर सुनी तो, हिय काँपा भौंहें तनी।
पाँव हटाते, पीछे कौंधी दामिनी।।
पायल टूटी, फूटी गगरी, हिय डरा।
बादल गरजे, बढ़ा सघन घन दायरा।।
क्या हुआ यहाँ, समझ न आया माज़रा।
धड़के जियरा , छूट गया सब आसरा।।
सुनो फलाने, पैजनी तो टूट गयी।
कल जो लाये, गागर भी तो फूट गयी।।
अब मैं कैसे, पनघट से पानी भरूँ।
बिन घूँघर तो, आने से भी मैं डरूँ।।
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करता है इंतज़ार कोई शिद्दत से, पलट जाया कर।
वो कभी हाथ फैलाये तो सीने से लिपट जाया कर।
घटित नहीं होता तकदीर में लिखा हुआ सब कुछ,
किसी दुपट्टे के जैसे इक घड़ी में अटक जाया कर।
मनहूसियत सी है दिमाग की सुनने वालों में,
तू किसी के दिल की सुन के भटक जाया कर।
जरूरी नहीं सुनना हर किसी के मन की बात,
अच्छी न लगे तेरे मन को तो डपट जाया कर।
संभव नहीं हर किसी की आंखों का तारा हो पाना,
बिना सोचे किसी की आंखों में खटक जाया कर।
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