Preeti Karn   (अनकही. ..)
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Joined 27 February 2017


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Joined 27 February 2017
Preeti Karn 7 HOURS AGO

गीतिका
अभ्यास
2122 2122. 2122 212

दीप यादों के जलाकर हम न सोयें रात भर
वेदना छलती रही मन की व्यथा किससे कहें।
अजनबी लगते सभी हैं शहर भी है गमज़दा
डूबती सांसें हमारी फलसफा किससे कहें।

कुछ रहे होंगे हमारे बेवजह के मामले
सुलझते हीं टूट जाएं उलझनें किससे कहें।
भूलकर भी अब न मानेंगे कभी बातें दिली
उमरभर इक जख्म लेकर शिकवे हम किससे कहें।


प्रीति कर्ण

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Preeti Karn 11 HOURS AGO


पत्तियों की चरमराहट सुनते पांव
मुड़कर पीछे देखते हैं
सूखे दरख्तों की टहनी
उलझती जंजीरों सी
रोक लेती हैं
वो किस्से सुनाती हवाएं
खुश्क होने के गम में
डूबी हैं
इक अरसे से नमी को
ढूंढते हैं हम
वो इश्क सी ही
लगी हर बार मुझे......

प्रीति

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Preeti Karn 16 AUG AT 22:03

परिदृश्य पल भर के
ठहराव की अनुमति लेकर
उपस्थित होते हैं
नदी की सतह पर!
मैं सहजता से
प्रतिबिंबित छवि को
निहारती हूं अपलक।
मेरा ध्येय
उसे भित्ति चित्रों में
परिवर्तित करना मात्र है
किंतु स्पर्श का कंपन
तहस नहस कर देता है
एक एक कर बिखरती
टूटती तरंगों को
तट से निहारती हैं आंखें।
मैं सहेजती हूं
अपने प्रतिबिंबित
सहस्र भग्न चेहरे।
अंजुरी भर जल से
आचमन की
अभिप्सा अनर्थ भी
रच जाती है।

प्रीति कर्ण


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Preeti Karn 16 AUG AT 8:37

मौन का वह आखिरी पल
मृत्यु से भी कम नहीं था
सांसें थी अति व्यग्र सी
वाचाल कोलाहल शिथिल था

डूबते तिरते हुए चलते रहे
कुछ देर तक हम
दूर तक वीरानियों में
कोई अवलंबन नहीं था।

प्रीति

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Preeti Karn 15 AUG AT 8:15

महज धागे नहीं कच्चे ये दृढता के हैं शुभ बंधन
करे शुभकामना सुख की लगाकर भाल पर चंदन
सकल हित की सदा चिंता करे बहना समर्पण से
निभाता धर्म भाई मिल. ये पावन पर्व अभिनंदन।

प्रीति

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Preeti Karn 14 AUG AT 16:14

2122 2122. 2122 212

अब हमारे बीच कोई सिलसिला बाकी नहीं
एक अरसा हो गया है टूट कर बिखरे हुए।
दिन बदलता रोज रंगत शाम कुछ गमगीन सी
रात अक्सर तोड़ती दम दिल कई टुकड़े हुए।

इक सुबह आए नयी सौगात लेकर सुनहरी
स्वप्न सा श्रृंगार सुंदर बूंद मुख ठहरे हुए।
नित नयी मृदु कल्पना लिखती अधर पर गीतिका
शब्द गढ़ते छंद कौशल भाव रस गहरे हुए।।

प्रीति

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Preeti Karn 14 AUG AT 15:40

गीतिका छंद

2122 2122 2122 212
124 सम तुकांत

बादलों ने रंग बदले अब लगे मधुमास है,
बूंद झरती भीगता मन रच रहा परिहास है।
प्रेम की परिकल्पनाएं मोहती अंतस्थली,
घन घिरे घनघोर नभ पर छलकता उल्लास है।

प्रीति

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Preeti Karn 13 AUG AT 17:00

कभी हसरतें न सोई कभी जागते रहे हम
कोई और वक्त था वो पास आते थे नहीं गम।

प्रीति

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Preeti Karn 13 AUG AT 10:38

दुखद कविताएँ
निरीह ताकती दीवारों पर
भरे मन से
उपले की भांति
थाप दी जाती हैं....
रस में डूबी
फिर भी
श्रीहीन।

प्रीति

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Preeti Karn 12 AUG AT 18:08


धूप निचोड़ कर
कुछ रंग घोले हैं!
बारिशें
आखिर कब काम
आतीं !!
यादों के जर्जर हुए
खंडहर की
दीवारों पर फिर से
चटख चित्रकारी
करती है
कविता!

प्रीति

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