Preeti Karn   (अनकही. ..)
5.3k Followers · 405 Following

read more
Joined 27 February 2017


read more
Joined 27 February 2017
Preeti Karn 4 JUL AT 21:47

सितारों में सितारे सा कहां कोई नज़र आया।
उसे दिल में बसाया जो नजारे सा नज़र आया।

प्रीति

-


53 likes · 10 comments
Preeti Karn 1 JUL AT 20:31

बहकती महकती हवा सी कोई
तन को छूकर जो गुज़री
हवा मैं हुई।
सदियों से पाषाण थी मैं जमी
एक पल में पिघलकर
नदी बन गई...

प्रीति

-


68 likes · 5 comments
Preeti Karn 26 JUN AT 13:42

अंगार पुष्प है दहक उठा, बुझती कैसे आग।
विरहा की जलती ज्वाला में, बढ़ता है अनुराग।
मदमस्त पवन पुरवा महकी, खिले कुसुम रसरंग।
उद्वेलित मन के परिसर में, सुख दुख सब इक संग।


प्रीति

-


68 likes · 18 comments · 1 share
Preeti Karn 18 JUN AT 19:11


मशवरे देती रही बस जिंदगी, क्या गुजरती है कभी सोचा नहीं।
वक्त मेरा था न यूंँ हमदर्द भी, बात बिगड़ी अब कभी बनती नहीं।

प्रीति

-


78 likes · 7 comments · 2 shares
Preeti Karn 14 JUN AT 12:55

जलता रहा मन रेत सा, अनुताप से जीवन भरा।
फिर नींद कोसों दूर थी, बादल घना ठहरा रहा।

व्याकुल हृदय की चेतना, संतप्त क्षण छलता रहा।
पीड़ित व्यथित संवेदना, चुपचाप ही भरती गई
धप से गिरी बूंदें धरा, मोती की झालर तन गई।

प्रीति

-


67 likes · 8 comments
Preeti Karn 12 JUN AT 10:13

इक दिन गुलमोहर हो जाना....

संवेदित मन की शाखाएं,
पर्णहरित कलियां कुम्हलाएं।
कृश तन मलिन हुए मुख मंडल,
आभासी पतझड़ हो जाना।
पीड़ा तुम प्रस्तर हो जाना।

आहत मन की करुण कथा में,
अवगुंठित अवसाद व्यथा में।
धीरज संबल ढूंढ न पाए,
क्षणभंगुर नश्वर हो जाना।
पीड़ा तुम प्रस्तर हो जाना।

प्रीति

-


76 likes · 35 comments · 1 share
Preeti Karn 10 JUN AT 17:42

अंजुरी में. विकल मन की आराधना
दीप लौ में जली, रात दिन कामना

सौंपकर प्रेम अक्षत, कुसुम माधुरी,
अर्घ्य में नित ढ़ली, मौन की वंदना।


प्रीति

-


74 likes · 8 comments
Preeti Karn 9 JUN AT 8:26



चाहकर भी छूटती दिल से नहीं जो।
क्या कहेंगे इश्क उस तिश्नालबी को।

टूटते तारों बताओ हाल ए दिल।
मुद्दतों तरसा किये हम जिंदगी को।

प्रीति

-


93 likes · 11 comments
Preeti Karn 6 JUN AT 11:39


नीले नभ की फैली बाहें, सागर का मन भरना चाहें ॎ
घिरे सघन फिर काले बादल, बरस गये आहत मन घायल|
वसुधा का लहराया आँचल, तृण तरुवर के अंतस निर्मल|
भीगा अंबर भीगी धरती,पावस ताप ह्रदय के हरती|

प्रीति

-


67 likes · 6 comments · 1 share
Preeti Karn 4 JUN AT 10:01

बरगद सी छाया सघन, पिता भरोसा आस।
जीवन के संघर्ष में, दृढ़ता का विश्वास।

स्नेह भाव की उर्वरा,भ्राता सुख अनमोल ।
आजीवन मुस्कान की, रखता मिसरी घोल।

तिनका तिनका जोड़ कर, बुनते सुंदर गेह।
कंचन सा तपकर सदा, पिता लुटाये स्नेह।

दायित्वों की पोटली, आजीवन सम्मान।
पूत पिता भ्राता सहित, पति का रखता मान।

संवेदित मन के धनी, पर्वत से गंभीर।
तरल हृदय होता रहा, दिखे न नैना नीर।

चौबारे के नीम सा, सुखद रखे परिवेश।
श्रेष्ठ पितामह सा खड़ा, हरित हृदय संदेश ।

प्रीति

-


88 likes · 14 comments · 2 shares

Fetching Preeti Karn Quotes

YQ_Launcher Write your own quotes on YourQuote app
Open App