Preeti Karn   (अनकही. ..)
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Joined 27 February 2017


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Joined 27 February 2017
Preeti Karn 16 HOURS AGO

अनंत काल तक यादों को
सहेजना मुश्किल होता है...
इसलिए खिल आते हैं
सुर्ख गुलमोहर.
बसंत के पीछे की सीढियों से!

मन की शुष्कता को नमी देने
के लिए
उतर आती हैं आसमान से
बारिश बूंदें!

अन्यमनस्कता से उपजी
ऊबन की
चुप्पियां तोड़ देती हैं
मोगरे की भीनी सुवास!

हवाएं थपथपाती हैं
मन के बंद द्वार
हौले से खुलते पट
सांसों के बदलाव को
जीने लगते हैं।

प्रीति
365 /124




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Preeti Karn YESTERDAY AT 13:20

दश्त ए तन्हाई में चलकर और कितना ढूंढते
मरकज़ ए ज़िंदगी इश्क सी अब हो गई !

प्रीति

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Preeti Karn 18 APR AT 10:28

मेरे अथक प्रयास की
सारी पहल
आत्म निवेदित उक्तियों का
परिणाम मात्र है
भय की अथाहता से
उबरने के लिए
भय का साक्षात्कार कर
भय जनित
सारे प्रमाण
मिटाए गए हैं
कई बार...

प्रीति
३६५ /१२३

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Preeti Karn 17 APR AT 15:58

सुबह की लम्बी परछाईयां भी शाम तक सिमट जाती हैं
लोग वही रहते हैं फासले तो हालात बना जाते हैं।

प्रीति
३६५ /१२२

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Preeti Karn 17 APR AT 9:49

कोई रौशनी न च़राग न जुगनूओं की आजमाइश ही
हर सम्त उस ओर ही रुख बेवज़ह नहीं करती।

प्रीति
३६५ /१२१

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Preeti Karn 16 APR AT 20:08

जीवन मोह
परिस्थितिजन्य विसंगतियों और
विषमताओं के
कड़वे घूंट की
उलाहना
उस वंचित सुख की
देहरी पर
थोप आती हैं
जहां से आत्मसम्मान
पीछे मुड़कर
कई बार देखता है
शायद उम्मीद के
गदराये वृक्ष से गिरे
भूमिगत परिपक्व फल
सुख की लालसा
को मोहपाश में
बांध गयी हो।

प्रीति
३६५ /१२०


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Preeti Karn 15 APR AT 9:42

मृदुता मुझसे मेरी
न छीन मानव
मैं मृदा ही रहना चाहती हूं
संदर्भों में पिसती रहूं
गलती रहूं
मिटती रहूं
आकृतियों में ढ़लती रहूं
स्वरुप की विशिष्टता ही
मेरी पहचान।
चाक पर चढ़ना
विधान है नियति का
किन्तु तपकर
मैं कभी पाषाण होना
नहीं चाहती
पुनर्निर्माण की
संभावनाएं शेष रख
मैं मृदा ही रहूं !!

प्रीति
३६५ /११९

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Preeti Karn 14 APR AT 16:10

नींद सरकती राह भटकती जाने कितनी दूर गयी
रात की चौखट रोज परेशां ख्वाहिशें थक कर चूर हुई।
प्रीति
३६५ /११८

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Preeti Karn 13 APR AT 13:24

गुजरना उन दरीचों से कहां आसान होता है
गुलों के रंग में खोया जहां यादों का सामान होता है।।

Preeti
365/117

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Preeti Karn 13 APR AT 7:54

जीवंतता रंगों की बांध
लेती है
मैं उचचकर अपनी संकीर्णता से
अनायास ही
बाहर निकल आती हूं
तुम्हारी बिखरी शाखों का
क्षणिक स्पर्श सुख
सहेजने के सफल
प्रयास में।
मेरी उंगलियां रंग से भीग
गयीं हैं
मेरा आत्मसुख भ्रमित वंचनाओं को
ठोकर माकर
आगे बढ़ रहा है
बोगनवीलिया तुम्हारी
रसानुभूति ही
प्रेम है।

प्रीति
३६५ /११६

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