623
Quotes
3.7k
Followers
353
Following

Preeti Karn (अनकही. ..)

Not a creative writer. Thoughtful sometimes.
Exploring my literary skills.
Preeti Karn YESTERDAY AT 9:06

असीम संभावनाएं दिखाई देती हैं
जब मुठ्ठी भर आशाएं
निहारती हैं विस्तृत आकाश
विपन्नता ओढ़ लेती है
संपन्नता की दुशाला
बरसती बूंदों की अजस्रता से
उपजे
निराधार तर्क
तोड़ देते हैं मिथक
स्वार्थी नहीं होता प्रेम
नि:स्वार्थता उर्वरित होती रहती है
बशर्ते तुम्हारे हृदय की
विशालता तुम्हें
स्वीकार्य हो!!

प्रीति
३६५ :५२

-


73 likes · 14 comments · 2 shares
Preeti Karn YESTERDAY AT 20:52

संवेदनाओं
का
क्रियान्वयन!!

प्रीति

-


Show more
59 likes · 5 comments
Preeti Karn 21 FEB AT 13:38

छुइमुइ सी नहीं रही
और न बनना ही था लाजवंती कभी
चट्टानों सी जिजीविषा
जिंदा रखती है
सींचने पाटने का अभाव
खलता है
लेकिन मुरझाने कुम्हलाने
तक नहीं पहुंचती
खिली रहती हूं
विषम परिस्थितियों में!
अतिवृष्टि अनावृष्टि की दुर्दांतता से
अप्रभावित
उस स्नेहिल स्पर्श का सुखद
अनुभव
जिसे पाकर अनायास ही
विहंस पड़ती हैं
शिराएं
जड़ से फुनगी तक
आपादमस्तक पुष्पित हो जाती हूं
मैं वो जंगली फूल
सिर्फ " बसंत" की
राह देखती हूं।।
प्रीति
३६५ :५२


-


59 likes · 21 comments · 1 share
Preeti Karn 19 FEB AT 20:08

आत्मसंतृप्ति का स्पंदन

प्रीति

-


Show more
54 likes · 5 comments · 1 share
Preeti Karn 19 FEB AT 17:53

चुभते रहेंगे शूल बनकर आंखों में ठहरे हुए हैं
अब न लौटेंगें कभी घर ज़ख्मों के पहरे बड़े हैं!!!

प्रीति
३६५ :५१

-


74 likes · 5 comments
Preeti Karn 19 FEB AT 11:02

आकांक्षा
कल्पना
स्मृति


#भूत
#भविष्य
#वर्तमान

प्रीति
३६५ :५०

-


Show more
58 likes · 3 comments · 2 shares
Preeti Karn 19 FEB AT 9:36

किसी दिशाहीन पथिक की भांति
अव्यवस्थित मन
अस्तित्व विहीनता के आत्मबोध का
पश्चाताप नहीं करता
अपितु जीना चाहता है
आकाश की स्वर्णाभ छटा का आनंदातिरेक
हवाओं में घुली रसाल मंजरी की
भीनी सुवास का उन्माद
जंगली फूलों से लदे तरु की शाखाओं में
चहचहाते खगवृंदों का कलरव गान
शनैः शनै: अपनी कक्षा में
स्थिर सा चढ़ता दिनकर का
बढ़ता आवेश
ऋतुओं की प्रासंगिकता से
तारतम्य स्थापित करती
मनोदशा!!
जीना चाहता है मन
पुन: पुन:।
प्रीति
३६५ :४९

-


54 likes · 10 comments
Preeti Karn 18 FEB AT 14:26

छांव सी मंज़िल
तुम!
मुसाफिर मैं
धूप का
ठहरा!!
प्रीति
३६५ :४८


-


Show more
77 likes · 3 comments
Preeti Karn 18 FEB AT 14:11

जारी है पत्तों का बिछड़ना
इक इक कर
वाजिब है दरख्तों का तन्हा होना
सियासतें जारी है नींद की रातों से
ख्वाब देखने भर की
गुंजाइशें तमाम
हो गई हैं
सूकून के हरे पत्ते
उगेंगे शाखों पर
मौसम ए गुल की
तहज़ीबों का यकीन
है अब भी...!!
प्रीति
३६५ :४७

-


64 likes · 14 comments
Preeti Karn 17 FEB AT 22:10

बदलते चेहरे की राजदारी
आईने तक रही


प्रीति
३६५ :४६

-


Show more
64 likes · 7 comments

Fetching Preeti Karn Quotes

YQ_Launcher Write your own quotes on YourQuote app
Open App