I hate Panipuri

Kya mai maafi ke layak hu😜

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गुज़रता ही नहीं अब इक पल भी
ओ ! रुकी हुई घड़ी अब चल भी

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वो यादों की गहराईयों में खोया-सा बचपन,
कल का सपना देखा-सा लगता है बचपन।

वो झूले की पेंघ बढ़ा कर नभ को छू जाना,
जा बगिया में शिखर दोपहरी पकड़ तितली इतराना।

कर शैतानी माँ को सताना, फिर नादानियों से हंसाना,
वो खेल-खिलौने, गुड्डे-गुड़ियों की यादों में सिमटा बचपन।

भीग बारिश में कंपकंपाना,पानी में पैर छपछपाना,
सोच कर ही अंतर्मन को भीगा देता है ये बचपन।

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ये कैसी आहट है
जो तेरा अहसास ले आई है
ये कैसी ख़ामोशी है
जो तेरी आवाज़ ले आई है

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आपसी रंजिशों को हर बार छोड़ देता हूं !
में खुद को हार के, हर बार तुझसे रिश्ता जोड़ लेता हूं ।।

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