मेरा क़िस्सा सुन लिया तो ग़मज़दा होने लगोगे,
मैं तुम्हारा कुछ नहीं हू फिर भी तुम रोने लगोगे....-
देखा जब मैंने कलम को तो पड़ी थी एक कोने में
उठाया हाथ में तो जाना माहिर बड़ी है सच बोलने में-
दिल करता है, तो मिलते क्यूँ नहीं
मिलने को एक हाँ, भरते क्यूँ नहीं
फिर रोने आओगे मेरी मज़ार पर
जीते-जी ये फ़ैसला, करते क्यूँ नहीं-
मेरा क़िस्सा सुन लिया तो ग़मज़दा होने लगोगे,
मैं तुम्हारा कुछ नहीं हू फिर भी तुम रोने लगोगे....-
कभी कभी रोने का मन होता है
आँखें मींच सोने का मन होता है
या तो कोई मुझे न दे दिखाई
या खुद ही अदृश्य होने का मन होता है
-
क्योंकि ज़नाब ये कोई ग़ैर इंसान नहीं बल्कि कलम होती है
जज़्बातों को बातों से तौलने की ना इनको ना आदत होती है-
रोने से पैसा मिलता तोह
आज दुनिया का सबसे बड़ा अमीर इंसान
मैं होता ।।-
तेरे सच से अनजान हूं मैं,
अनजान मुझे तु रहने दे।
तेरे गमों से रोता ये दिल,
तेरी याद में इसको रोने दे।
-
घर की पुरानी दीवारों में अब सीलन होने लगी है,
सुंदरता के साथ ये अपनी मजबूती भी खोने लगी हैं!!
संजो के रखा था अब तक ना जाने कितनी यादों को,
देख के कोने में वो संदूक टूटी, यादें भी रोने लगी है!!
ईट, पत्थर, चूने, लोहे, लकड़ी से बनाया था इसको,
टपकती छत, अब फर्श ख़ुद - ब - ख़ुद धोने लगी है!!
बचपन, यौवन, जवानी, बुढ़ापा सब देखा है यहाँ पर,
अब मौत के इंतज़ार में मेरी साँसें भी सोने लगी है!!
दु:ख, दर्द, व्याधि,थकान,अकेलापन सब देखा कुमार',
उम्र मेरी अब, इस शरीर और मकान को ढोने लगी है!!
-