Anuup Kamal Agrawal   (A.AG.)
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Joined 4 October 2016


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Joined 4 October 2016


जब से तेरी देह को छू आये हैं नयन
भूल गया हूँ भोजन भूल गया शयन

लगता है तेरी देह को छू आयी है पवन
महक उठी हैं साँसे बहक गया ये मन

छूती मेरी उँगलियाँ जब भी तेरा तन
लागे जैसे बाँसुरी को चूमते किशन

वन में खोजे कस्तूरी भटक रहा हिरन
लगाले तू गले और मिटा दे ये अगन

भँवरे की छुवन से खिल जाने दे सुमन
सृजन है प्रकृति प्रकृति है सृजन

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दीवारों से इतनी दोस्ती हो गयी है
रो देते हैं एक दूसरे की दरारों को देखकर

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पेट जब खाली होता है
तो दिमाग मवाली होता है

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I always plan to
note down my plans.

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तू गर चाहती है और जिऊँ मैं
ऐ ज़िंदगी तू कोई ख़्वाब तो दे

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कोई लिखता है ज़िंदगी से हारकर
कोई लिखता है ज़िंदगी को मारकर
कोई ज़िंदगी को खोकर लिखता है
कोई ज़िंदगी का होकर लिखता है
लिखना ही किसी की जिंदगी है
"लिखना" ही किसी की ज़िंदगी है।

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एक दीया जलता देखा उसकी हथेली पर।
जाते देखा जिंदगी को थी वो अकेली पर।

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still a fiction.

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Anuup Kamal Agrawal 10 HOURS AGO

has a lesson for everyone.

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Anuup Kamal Agrawal 11 HOURS AGO

और एक सबक भी

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