भरे जख्म फिर से सताने लगे है
वो फिर से कही दिल लगाने लगे है
जिन्हे भूलने मे जमाने लगे है
वो अब गैर संग नज़र आने लगे है
दवा वो नशे से भुलाए जो सपने
वही ख्वाब आँखो मे छाने लगे है
जो गुज़रे है वक़्त क़यामत के जैसे
उसी दौर मे हम जाने लगे है
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जितना हम सोच लेते है
कदम बढ़ाने से पहले ही ना जाने क्यों मुंह मोड़ लेते है
मुश्किलें हमेशा तो नहीं रहती उनसे भी हम लड़ सकते है
थोड़ी प्रयास कर अपने ख्वाबों को हम भी तो हकीकत में बदल सकते है-
Wo mere khwabon mein aata hai, so jaata hai.
Jab ankhen bat karti Hain Ankhon me kho jata h.-
मैं एक ख़्वाब के अंदर बिखरता जाता हूँ
ख़ुदा के वास्ते कोई मुझे उठाओ भी..-
बिखरे जुल्फों की लटें,
चेहरे पर ठिकाना ढूंढ रही हैं।
कभी होठों पर,कभी गालों पर बिखरकर,
उन्हें चूमने का बहाना ढूंढ रही हैं।
भर के नज़र वो देखें भी तो कैसे हमें,
जिनकी नज़रें आज बग़ावत कर रही हैं।
चौबारे के उन खिड़कियों से इशारा करके,
दामन को एक सलीके से ले रहीं हैं।-
सोचा था उंचाई मुकम्मल होगी तो,ख्वाब हासिल होगा!
पता चला, ख्वाब की कोई उंचाई नहीं होती!!-
सोचा था ख्याबों को हकीकत बनायेगें ।
आलम ये हुआ कि ...
अब हकीकत भी फंसाने बन गये॥-
वर्षो बाद गम ने अपनी मौजूदगी दिखाई है,
उस रातों के बाद,हमें नींद नही आयी है।
ख़्वाबों में जाने के लिए मुंतजिर बढ़ आयी है,
उस रात के बाद हमें नींद कहाँ आयी है।
आँखें बंद करूँ जब,पाज़ेब की खनक के संग
कानों में वादियों की धुन,मोहब्बत ने सुनाई है।
ऐसा लगता है उनका जाना एक बुरा सपना था,
और चेतना आयी जब,तो उम्र ढल आयी है।
ज़िन्दगी के सफर में असमंजस कुछ यूं बन आयी है,
मौज-ए-हवा भी आज दर्द का बादल लें आयी है।
रास्ते हैं अनेक और पैरों में यादों की जंजीर लगाई है,
ये इश्क़ हमें आज,नजाने किस मोड़ पर ले आयी है।
कैसे बताऊं की कितनी मोहब्बत है उनसे,
जिसका पैमाना खुदा ने न बनाई है।
ये क़लम भी अब बेवफ़ाई करने लगे हैं,
जिसे सच लिखने की चूल मच आयी है।-
कभी हवा, कभी पानी, कभी खुशबू,
तो कभी बहार बन के आ जाएंगे,
हम तेरे ख्यालों के अखबार में,
अनचाहे इश्तिहार बन के आ जाएंगे।-
मेरे आंखों में एक ख्वाबों का दरिया बहता है
कितना खुश नसीब है वो शख्स,
जिसके पास ये हकीकत का परिंदा रहता है,
सुना तो हमने भी था फिल्मों में की तारे जमीं पर है,
मगर देखा पहली बार है कि एक चांद भी जमीं पर रहता है-