Mahender Kumar   (Sani)
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Urdu Poet
Joined 29 November 2017


Urdu Poet
Joined 29 November 2017
Mahender Kumar 26 NOV AT 22:12

تری قربتوں میں گزر رہے ہیں ہمارے دن
ہمیں کیوں مگر ترا تجربہ نہیں ہو رہا

तिरी क़ुर्बतों में गुज़र रहे हैं हमारे दिन
हमें क्यूँ मगर तिरा तजरबा नहीं हो रहा

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#mksani #cinemagraph
*क़ुर्बत - नज़दीकी

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Mahender Kumar 24 NOV AT 0:29

आख़िरी बार को मिलने के लिए आना है
फिर हमेशा के लिए हमको बिछड़ जाना है

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Mahender Kumar 15 NOV AT 20:35

घर की वीरानी
जब दिल की वीरानी से मिल जाती है
वीरानी की वुसअत में
कुछ और इज़ाफ़ा हो जाता है

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*वुसअत - विस्तार
#mksani #घरकीवीरानी

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Mahender Kumar 15 NOV AT 19:37

ये दिल - ये शहरे-बला छोड़ कर नहीं जाते
हम अपने आपसे जब तक कि भर नहीं जाते

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Mahender Kumar 26 SEP AT 2:03

दीवारे-ख़्वाब में कोई दर कर नहीं सके
हम लोग शब से आगे सफ़र कर नहीं सके

इक शाम के चले हुए पहुँचे मियाने-शब
भटके कुछ इस तरह कि सहर कर नहीं सके

शायद अभी रिहाई नहीं चाहते थे हम
सो उस को अपनी कोई ख़बर कर नहीं सके

हम कारे-ज़िन्दगी की तरह कारे-आशिक़ी
करना तो चाहते थे मगर कर नहीं सके

आँखों पे किस के ख़्वाब पर्दा पड़ा रहा
हम चाह कर भी ख़ुद पे नज़र कर नहीं सके

तुम से भी पहले कितनों ने खाई यहाँ शिकस्त!
दुनिया को फ़त्ह तुम भी अगर कर नहीं सके?

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Mahender Kumar 10 SEP AT 9:02

सलाम

दीजे मेरी आँखों को वरदान हुसैन
रोएँ आपकी याद में ये हर आन हुसैन

मैं पानी को कैसे हाथ लगाऊँ आज
आज प्यास से होंगे बहुत हल्कान हुसैन

सब दुनिया शाहों की, शाह यज़ीद के हैं
इंसानों की ख़ातिर इक इंसान हुसैन

अव्वल अल्लाह, अल्ला ही आख़िर धर्म का मर्म
जिसकी ज़ात से फूटा है ये ज्ञान हुसैन

कैसी लड़ाई, कैसी कर्बल, कौन यज़ीद
मेरे बातिन में केवल इक ध्यान हुसैन

मैं बदअक़्ल निमाना मुझको क्या मालूम
कैसे आपका करते हैं गुणगान हुसैन

शब्दों के सूखे हुए फूल करें स्वीकार
मुझ ग़रीब का रख लीजे कुछ मान हुसैन

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Mahender Kumar 6 SEP AT 16:44

اک عجب نیند کے عالم میں گزرتی ہوئی عمر
خود کو آواز پہ آواز لگاتے ہوئے ہم

इक अजब नींद के आलम में गुज़रती हुई उम्र
ख़ुद को आवाज़ पे आवाज़ लगाते हुए हम

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Mahender Kumar 6 SEP AT 0:51

ہم پچھلے دو گھنٹوں سے
ایک دوسرے کے بر عکس
پڑے ہوئے ہیں بستر میں
موبائل کی بانہوں میں

हम पिछले दो घंटों से
एक दूसरे के बर अक्स
पड़े हुए हैं बिस्तर में
मोबाइल की बाँहों में

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Mahender Kumar 1 SEP AT 0:47

حسین دھیان کا دیپک
شعور کی لو ہے

हुसैन ध्यान का दीपक
शऊर की लौ है

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Mahender Kumar 21 AUG AT 7:17

मैंने सपने में उसको हँसते देखा
खिली खिली है मेरी आँखों की रेखा

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