गंगा मैली नहीं होती, अस्थियों के बहाने से
गंगा मैली होती है, पापियों के नहाने से-
महाज्ञानी परम शिवभक्त ब्राह्मणवंशी
महाबलि परस्त्री के शील के प्रति मर्यादित
मात्र अपहरण के कारण कुल सहित नष्ट
हो गया और आज तक बुराई के प्रतीक के
रूप में हर साल जलाया जाता है...
और निकृष्ट पापी छोटी छोटी कन्याओं
तक को बर्बाद करने वाले बेशर्म शान से
से समाज में जीते हैं...
क्यों..??
या तो रावण जैसे पापी नहीं हैं
या फिर..
सीता जैसी सती नारी नहीं हैं..
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जाने किस अपराध पर, मिला गंगा को श्राप
युगों युगों से धो रही, पापियों के पाप-
वो तीरथ नहाने गया था,
पाप बख्शाने गया था,
लगता है नए पाप करने की
जगह बनाने गया था
ਓਹ ਤੀਰਥ ਨਹਾਉਣ ਗਿਆ ਸੀ
ਪਾਪ ਬਖਸ਼ਾਉਣ ਗਿਆ ਸੀ
ਲਗਦਾ ਹੈ ਨਵੇਂ ਪਾਪ ਕਰਨ ਲਈ
ਜਗ੍ਹਾ ਬਣਾਉਣ ਗਿਆ ਸੀ-
इस पापी दुनिया में समझदारों को..
यहाँ तो अपनी पहचान बनाने के लिए
गुन्हेगार बनना पड़ता है।-
आख़िर क्यों..?
अतिहर्ष से तीनों आनन्दित थे,
दौड़ भाग छिपन छिपाई व
रंगीन बॉल पकड़म पकड़ी
खुशी खुशी वे खेल रहे थे।
माँ की ममता की कलकल,
पिता की पर्वत सी छाया ने,
गुड़िया का मन अति हर्षाया,
बिटिया पर प्रेम उमड़ आया।
अनुशीर्षक में.......-
मेरे लिए चेहरे खूबसूरत हो ये मायने नहीं रखता हुजूर
बस शरीर लड़की का हो हम हैवानियत पर उतर जाते हैं,— % &-