QUOTES ON #कवियत्री

#कवियत्री quotes

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7 AUG 2020 AT 11:35

लिहिते मी कविता तुझ्याचसाठी
मनी येताच आठवण जसजशी.....

तुझ्या आठवणीत झाले कवियित्री
भावना शब्दात आल्या ओठांवरी.....

अचानक तू सोडताच साथ माझी
दुःख अन् शब्द झाले मज सोबती.....

लिहिते मी कविता तुझ्याचसाठी
जेव्हा आठवणींसवे असते एकटी......

सख्या वाटतं तू वाचावी एकदातरी
कौतुकाची फुले बहरवावी माझ्यावरी.....

– Ashwini Gajbhiye✍️(शब्दाश्विनी)

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11 APR 2021 AT 1:58

सुनो तुम,

दहेज नहीं चाहिए मुझे,
अपने संग ले आना
तुम्हारी लिखी
कविताओं का पुलिंदा ।

उम्र भर सुनाना तुम,
चाय के संग!
मैं रहूंगा तुम्हारी
कविताओं में बाशिंदा ।

शेष अनुशीर्षक में पढ़ें...

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5 OCT 2019 AT 10:25

उनके प्रथम स्पर्श की भांति मैं करती हूँ विचार-विमर्श
और खो जाती हूँ मैं, मैं नही उनकी हो जाती हूँ सर्वस्व
प्रेमालिंगन मिलन परिणामस्वरूप गर्भधारण करती हूँ
और जन्म देती हूँ प्रेम वशीभूत प्रेमरस की कविता को

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26 SEP 2019 AT 14:57

उन्मुक्त चित्त भाव के रस को स्वतंत्र लेखनी में भरना होता है
लेखनी के रससे अभिनिवेश प्राण प्रतिष्ठा पन्ना करना होता है
कवियत्री व्यवस्थापिका होने में उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण करती है
भिन्न-भिन्न इंद्रधनुषी रंग वो बाग-बगीचों के पुष्पों से चुनती है
सागर की गहराई तरती है और कभी नभ में विचरण करती है
जलयान मेंहो सवार कभी वो बारिश के तरंगों पर थिरकती है
इष्ट का गुणगान करती, निर्गुण भजन वो सुबह-शाम करती है
माँ पत्नी बहन प्रेयसी नेत्री न जाने क्या क्या किरदार करती है
नृत्य-संगीत नाट्य-मंचन भाव-भंगिमाओं का विस्तार करती है
कवियत्री बनना सहज नहीं होता, दिन-रात तिल-तिल मरती है

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11 OCT 2019 AT 22:37

शशिश्वेत चतुर्दशीयुक्त-चंद्रमा नभ में शोभायमान है
आह्लादिनी कलायुक्त कर्म चंचल दृग में विद्यमान है
संभावित गर्भ की पीड़ा प्रयत्नशीलता की दौड़ में है
कविता कोई जन्म लेने वाली हैं गर्भ अभी प्रौढ़ में है

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25 NOV 2020 AT 22:15

सुनो तुम अब रूठो ना मुझसे,
मेरा प्रेम ये झूठा नहीं है।
वो चाहत ही जिसमें हो तुम ना
प्रिय, प्रीत वह अनूठा नहीं है!

मेरी लेखन का सार है तुमसे,
तुम ही शब्द, अक्षर और स्वर हो।
मैं कवियत्री नहीं जो ना तुम पर
लिखी युग में कोई कविता नहीं है।

(पूरी कविता कैप्शन में पढ़े...)

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2 MAR 2020 AT 17:30

अस्तांचल पश्चिमोत्तर सूर्य रक्तिम सूर्ख स्वरुप
वसुधा पर पीली छाई अति लंबी खिंचती धूप
खगा लौट रहे घोंसलों में लेकर अन्न का दाना
नन्हे-मुन्ने पंछियों को उनसे ही है भोज्य पाना
देवालयों में गुंज रही है देव की आरती पावन
गोधूलि बेला दीप प्रज्जवलित कर मनभावन

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19 FEB 2020 AT 18:26

कैसे जाए पनीआ भरन को रे
कैसे जाए
छलिया तट पर जाल बिछाए रे
मन भरमाए
बंसी धुन में मन मोहाए रे
तन सोहाए
प्रेम पुलक अंग अंग रंगाए रे
मद छाए

क्रमशः अनुशीर्षक में संलग्न..

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1 FEB 2020 AT 21:39

प्रेम व्याकुलता जब धरे है प्रत्यंचा पर वाण
प्राण विमुग्धा हो कवियत्री लिखती प्रेम गान
वसुधा नृत्यांगना बन करती नृत्य अति विहंग
नभ दर्शक बन देखता तकता वसुधा अंग अंग
भंवरा झूमता गुंजित गीत घूमकर पुष्प पलाश
कवियत्री रति रुत रचती है कलि मादक आस
टूट टूटकर बिखर गयो जो सेज मुलायम घास
इसी घास पर क्षणभंगुर मेरो प्रीतम को है वास
शरद ऋतु पाछो गयो अब नव अनुराग वसंत
तन-मन व्याकुल मिलन को प्रीत रीत अत्यंत
पुष्प तरु अरु डाल-डाल गुंथित है माला जाल
प्रेम पुरुष की प्रतीक्षा में ले खड़ी हाथ जयमाल
आ जाओ हे नयनराज मेरे ऋतुराज नवदुत
प्रेम कुमार धूमल सुकुमार राजकुमार अद्भुत..

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2 MAR 2020 AT 14:40

पनघट पर हो आई है जब पनिहारिन को मेला
रुप निहारण आयो छलिया सांझ पहर को बेला
भर पनिया गगरी सिर रख घर जानो को आतुरता
राह रोक छेड़े बनवारी कहे हिय उत्पन्न व्याकुलता
बांह पकड़ के अंक में भरके कहे की प्यास बुझा दे
बजा बांसुरिया कहे वो मुझसे प्रेम की राह सुझा दे
मोह के नयनों में मोहन ने ऐसो मोहे बिठाया संग
संग बिठाकर रंग दिया मुझको हरियर पीयर रंग

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