Vaidehi Rajput   (@_उन्मुक्त_चित्त..)
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कलम की नोक हूँ
शब्दों की तोप हूँ
जरा बचके जनाब
पूरे करती हूं हिसाब..
Joined 20 January 2019


कलम की नोक हूँ
शब्दों की तोप हूँ
जरा बचके जनाब
पूरे करती हूं हिसाब..
Joined 20 January 2019
Vaidehi Rajput 4 HOURS AGO

उन्होंने कहा..
अधिक देर न लगाओ बस चली आओ
छोड़ो साज-सज्जा रूप और न नहाओ
छोड़ो झुमका कान में तुम ना लटकाओ
छोड़ो नथिया नासिका तुम न छिदवाओ
छोड़ो अधर को न रंगो गुलाबी ही लाओ
छोड़ो श्रृंगार गले को हार भी न पहनाओ
छोड़ो काजल बिंदी आओ नहीं शरमाओ
छोड़ो चुड़ी-कंगन हाथों को नहीं सजाओ
छोड़ो मुंदरी उंगली हस्त मेहंदी न लगाओ
छोड़ो पायल बिछिया नुपुर न झनझनाओ
छोड़ो पांव महावर नखत को भी न रंगाओ
छोड़ो अंगिया डोरी को तुम यूँ ना बंधवाओ
अधिक देर नहीं लगाओ जल्दी चली आओ

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Vaidehi Rajput 5 HOURS AGO

जलधियान पर हो सवार कोई दैत्य है आनेवाला
प्रचंड वायुवेग रूप महाराष्ट्र गुजरात उड़ानेवाला
निसर्ग नाम का भीषण चक्र है घूम रहा चक्रवात
कभी पूर्व कभी पश्चिम से कर रहा हमपे आघात
डगमग-डगमग डोल-डोलकर सामुद्रिक धाराएँ
खंड-खंड कर रही मनु को बंद कर रही काराएँ
लूटपाट करके बंगाल को अबकी इधर की बारी
महाराष्ट्र गुजरात भी अब प्रकृति को लगी प्यारी

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Vaidehi Rajput 6 HOURS AGO

क्रंदन करता रहा शीशु अपार
माँ की ममता चुपचाप रही निहार
भीड़ बाजार में ‌भरी पड़ी थी
दृष्टि में हवस बहुत बड़ी थी

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Vaidehi Rajput 12 HOURS AGO

पौरुष मानसिकता से
पोषित स्त्री
दंड स्वरुप
उद्घोषित स्त्री
निर्दोष निर्विकार
आकार धारण करती है
शिला अहिल्या

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Vaidehi Rajput 13 HOURS AGO

जठराग्नि से उत्पन्न
अन्न की इच्छा में
बिखेर देती है
देवी शैया पर
अपनी देह को
विषाक्त सामाजिक
विष को धारण
करने के लिए
शिव के स्वरूप में
गणिका की उपस्थिति
वसुधा की यही स्थिति

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Vaidehi Rajput 21 HOURS AGO

सर्प भी बदलते हैं केंचुली निश्चित अवधि के उपरांत
और एक वो हैं जो रंग बदलते हैं लगातार दिन-रात
सत्य की अवहेलना यदि कहकर की गई मनोरंजन
क्या अंतर रह गया मुझमें मध्य बची बासी व्यंजन

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Vaidehi Rajput 31 MAY AT 21:15

राम नाम सत्य है..

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Vaidehi Rajput 31 MAY AT 20:13

उज्जवल जब देशभक्ति की भावना हो
स्त्री में भी समाज सेवा की संभावना हो
तभी धराऽवतरण होती है अहिल्या बाई
भक्ति शक्ति सहित अन्य देशहित निभाई

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Vaidehi Rajput 31 MAY AT 19:35

पिता सा प्रेमी
भाई सा सप्रेमी
माँ सी बातसल्यता
मेरे मन में यही प्रेम है पलता
यदि कोई हो तो बताना
मुझसे प्रेम करने आना

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Vaidehi Rajput 31 MAY AT 13:53

मन-मस्तिष्क कुंभलाकर उत्पन्न सांवला प्रेत
दंत भयावह केश विकृत भयंकर सा अश्वेत
उसकी निज छायावृत्त से आविर्भूत सम रेत
देख दृश्यावलोकन छवि सहसा हो गई अचेत
मेरे ही मन के प्रशाल से आविर्भाव वो भवेत
मैं ही छिन्न-भिन्न हो गई निज सोच विचार बेंत

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