Zohaib Baig (Ambar Amrohvi)   (امبر امروہوی)
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Joined 17 August 2018


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Joined 17 August 2018

आज आये हैं तेरे दर पर जौन,
देर से आये पर दुरुस्त आये..






अमरोहा में हज़रत जौन एलिया के मकान में जौन साहब की मेज के आगे उन्ही की जगह बैठे हुए।
(उस दौर में जौन साहब बैंत की कुरसी पर बैठा करते थे)

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ज़ख्म-ए-दिल आज फिर हरा कर के,
ग़ैर का मुझ से तज़किरा कर के..

वहशत-ए-दिल से आशना कर के,
वो गया मुझ को ग़म-ज़दा कर के..

सोच में डाल बे-वफाओं को,
खुद को इक बार बे-वफ़ा कर के..

वो कई बार मुझ से बिछड़ा है,
फिर से मिलने का रास्ता कर के..

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شہر بھر سے یہ اداسی نہیں دیکھی جاتی،
کوئی ہنستی ہوئی تصویر لگا ڈی پی پر۔۔

शहर भर से ये उदासी नहीं देखी जाती,
कोई हँसती हुई तस्वीर लगा डी.पी. पर..!!

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कैसा जाम सुराही कैसी भूल गए मयख़ाने लोग,
देख के तेरी आँखे साक़ी तोड़ गये पैमाने लोग..

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मेरे किरदार का मरना तय है!
अब कहानी का बिखरना तय है..

मेरा किरदार जहां डूबेगा,
तेरा किरदार उभरना तय है..

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होंटों से जुदा अब तो तेरा नाम नहीं है,
और इस के सिवा कोई हमें काम नहीं है..

गुज़रा हूँ मुहब्बत में हर इक राहे-जुनूँ से,
अब फ़िक्र तेरी गर्दिशे-अय्याम नहीं है..

ہونٹوں سے جُدا اب تو تیرا نام نہیں ہے،
اور اِس کے سوا کوئی ہمیں کام نہیں ہے۔۔

گزرا ہوں محبّت میں ہر اِک راہِ جنوں سے،
اب فکر تیری گردشے ایّام نہیں ہے۔۔

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अपने अशआर की तरह बहुत ही ज़िंदा दिल,
बहुत खुश-मिज़ाज इंसान इंसान हैं
जनाब ज़ुबैर अली ताबिश साहब।
मेरी ख़ुशबख़्ती है कि ज़ुबैर साहब के
साथ स्टेज शेयर करने का मौक़ा मिला।।

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रुख़ हवा का बदल गया कोई,
वाह क्या चाल चल गया कोई..

लोग घर से निकल नहीं पाये,
आइने से निकल गया कोई..!!

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सोचिये__जिस्म-ओ-जान में क्या है?
दिल के__ख़ाली मकान में क्या है..??

ख़ास किरदार__मर गये सारे,
अब मिरी__दास्तान में क्या है..??

पूछना तुम__किसी परिंदे से,
लुत्फ़__ऊंची उड़ान में क्या है..??

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ISLAMIC NEW YEAR

सच है शब्बीर के मातम से शुरू होता है,
हर नया साल मिरा ग़म से शुरू होता है..

سچ ہے شبّیر کے ماتم سے شروع ہوتا ہے
ہر نیا سال میرا غم سے شروع ہوتا ہے

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