YQ Sahitya   (सआदत हसन मंटो)
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Joined 28 June 2018


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YQ Sahitya 11 MAY AT 19:43

अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो ये ज़माना ही नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है

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YQ Sahitya 11 MAY AT 5:26

"हमने 'पोखरण २' किसी
आत्मश्लाघा के लिए नहीं किया था।
किसी पुरुषार्थ के प्रकटीकरण
के लिए नहीं किया था।
वह देश के आत्मरक्षा हेतु था।"

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YQ Sahitya 10 MAY AT 19:16

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

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YQ Sahitya 9 MAY AT 13:04

"मैंने अपनी पीड़ा
किसी को नहीं बताई
क्योंकि मेरा मानना है कि
व्यक्ति में इतनी ताकत
हमेशा होनी चाहिए कि
अपने
दुख, अपने संघर्षों से
अकेले जूझ सकें।"

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YQ Sahitya 8 MAY AT 15:13

किस शख़्सियत का चित्र है?

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YQ Sahitya 6 MAY AT 18:55

प्रत्येक लिखने का शौकीन व्यक्ति एक तख़ल्लुस रखता है यानी कि लेखक के तौर पर कोई उपनाम।

जैसे सूर्यकांत त्रिपाठी का उपनाम 'निराला' था।

आज आप सभी को अपने उपनाम/तख़ल्लुस रखने के पीछे का कारण बताना है।

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YQ Sahitya 5 MAY AT 19:11

वह चले झोंके कि काँपे, भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर, गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित, घोंसलों पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़, ईंट, पत्थर के महल-घर;

नाश के दु:ख से कभी, दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से, सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर!

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YQ Sahitya 5 MAY AT 10:04

मस्जिदों के मनारों ने देखा उन्हें
मंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मय-कदों की दराड़ों ने देखा उन्हें

इक चमेली के मंडवे-तले
मय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन
प्यार की आग में जल गए

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YQ Sahitya 3 MAY AT 12:48

'जाकी रही भावना जैसी'
आज बात बिरह के साहित्य पर

नागिन बैठी राह में, बिरहन पहुँची आय
नागिन डर पीछे भई, कहीं बिरहन डस न जाय

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YQ Sahitya 1 MAY AT 18:02

अजब तोरी दुनिया, हे मोरे रामा
क़दम-क़दम देखी भूल-भुलैयां
गज़ब तोरी दुनिया हो मोरे रामा

कोई कहे जग झूठा सपना, पानी की बुलबुलिया
हर किताब में अलग-अलग है इस दुनिया का हुलिया
सच मानो या इसको झूठी मानो
बेढब तोरी दुनिया हो मोरे रामा

परबत काटे सागर पाटे, महल बनाए हमने
पत्थर पे बगिया लहराई फूल खिलाए हमने
हो के हमारी हुई न हमारी
अलग तोरी दुनिया हो मोरे रामा

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