Vijeta Rathoure   (Vijeta Rathoure..'नीर'🍁)
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अपनी तो तलाश ज़ारी है.......🔍☺️
Joined 7 October 2017


अपनी तो तलाश ज़ारी है.......🔍☺️
Joined 7 October 2017
Vijeta Rathoure YESTERDAY AT 20:17

तुम याद करते हो
या फिर
मुझे कुछ हो जाता है
जाने क्यों
रह-रहकर
तुमपे
बहुत प्यार आता है।

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Vijeta Rathoure 13 AUG AT 8:41

आग को आग रहने दे पानी न कर,
छोड़ दे पीछा ऐ याद और मनमानी न कर।

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Vijeta Rathoure 10 AUG AT 14:49

वो मेरे जीवन में पढ़ा जाने वाला रोज का काव्य है,
मैं उसके ज़हन में गूंजती रोज की गज़ल हूँ।

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Vijeta Rathoure 10 AUG AT 11:38

खोटे सिक्के भी आसमाँ तक उछाले जाएंगेे,
दिल के फैसले जब तक टाले जाएँगे।

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Vijeta Rathoure 10 AUG AT 10:36

सपने पाले जाते हैं
पलकों पर
बेटों की तरह
लेकिन...
कैद कर दिये जाते हैं
आंखों में
बेटियों की तरह।
परवरिश
अच्छी हो तो
लिख आते हैं नाम
आसमाँ की भाप में
बुलंदियों से
न हो तो
घोलते रहते हैं
टूटी कांच के बारीक टुकड़े
खून में
आजीवन
या विदा कर दिए जाते हैं
डोली की अर्थी में बिठाकर
सदा के लिए।

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Vijeta Rathoure 10 AUG AT 10:00

एक दिन और मिला
कल रात मौत ने फिर नहीं छुआ।

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Vijeta Rathoure 3 AUG AT 20:12

तू सुकून है मेरा..।

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Vijeta Rathoure 3 AUG AT 17:18

कच्चे धागों से लिपटा
जिसे सुलझाते
खुद उलझ जाती हूँ मैं
बार-बार...।

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Vijeta Rathoure 3 AUG AT 14:17

कहानी लिखनी है तो सलीके से लिख ऐ जिंदगी
इतनी काट छांट मत कर की मैं रद्दी हो जाऊँ।

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Vijeta Rathoure 3 AUG AT 13:51

हौसले मेरे इतने कच्चे नहीं
कि बांध सके कोई बंधन
छोड़ दिया कागजीपन मैंने
कब का...
जिसे बारिश, पानी की छींटें दिखाकर
कोई डोर आंखे दिखाकर
डरा लेती थी हमेंशा
अब मैं प्लास्टिक की
कांच के अपने मांछें लिए उड़ती निडर पतंग हूँ
जानती हूँ एक न दिन कटूंगी मैं भी लेकिन उस दिन भी
जमीं पर मुंह के बल गिरने या एक नयी जिंदगी
पाने से ठीक पहले तक
बांहें फैलाकर लहराना चाहती हूँ
किसी टहनी या खम्भे में फंस गई तो भी
फड़फड़ाना चाहती हूँ
चाहे महीनों तड़पूं लड़ूंगी अंतिम सांस तक
इतनी आसानी से लोगों को खुद को भूलने न दूंगी
और हाँ जब गिरूंगी तो लोग
बिना तालियां बजाए न रह सकेंगे।
कवि कविताएं लिखेंगे
लोग शाबाशी देंगे
मैं साहस फूंक दूंगी घर की खिड़कियों में
कमजोर भला कब तक और क्यों रहें कागजी..?

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