Sweta Mehta   (Sweta mehta)
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Joined 11 May 2019


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Joined 11 May 2019
22 JUN AT 12:52

घर की बंद खिड़कियाँ अब खुलने लगी है,
तुलसी के झुलसे पौध
लगे हैं हरियाने फिर से,
घर के मंदिर की घंटियाँ भी
सुबह-शाम अब बजने लगी है।
रसोई घर के डब्बों में पड़ी वस्तुऐं
आने लगी है उपयोग में,
किनारे किए गए कुछ बर्तन,
फिर से खनकने लगे हैं।
चाय की प्याली हर सुबह
फिर सजने लगी है मेज पर,
देर शाम बच्चों संग किलकारियां
अब फिर लगी है गूंजने ,
आस पड़ोस की खैर-खबर
पडने लगी है कानों में।
चिड़ियों की आहट आने लगी है आंगन में
लगता है कोई वर्षों बाद
लौटकर घर आया है।

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12 JAN AT 15:52

कितनी खुदगर्ज हूँ
स्वयं को ढूंढ रही हूँ...!

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6 JAN 2024 AT 11:35

एक प्रेम पाति लिख रहीं हूँ
पढ़ लेना,
पढ़ पाओ यदि...
(Read in caption👇)

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24 SEP 2023 AT 13:54

तुम आना मेरे दिल में
शून्य तलक़
और रह जाना तब तक
जब तक ‌,
शेष न रह जाए शून्य भी...!!!

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3 SEP 2023 AT 7:23

बस इतना‌ सा फर्क रखना,
मैं तुझमें प्रेम देखूँ
तुम मुझमें देह ही देखना...!!!

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13 APR 2023 AT 14:42

बहुत मसरूफ़ रहती हूँ गम में अपने ‌ ,
जरा दिल दुखाने‌ की कवायद कर दो.... !!!

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8 JAN 2023 AT 20:17

सहज स्वीकृति ही.....
प्रेम है !!!

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7 JAN 2023 AT 11:36

शीतलहर से झुलसते पौध
हर सुबह बाट जोहते हुए ,
निहारते हैं आसमान
शायद इसलिए
.
.
.
किसान को नहीं सताती सरदी !!!


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2 NOV 2022 AT 12:13

विकल मन... विलय चाहता है
मन से मन का...
नयन और नयन का...
प्राण से प्राण का...!!!

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27 OCT 2022 AT 23:11

रख लेना जमीं सारी अपने वास्ते
मेरे लिए खुला आसमान छोड़ देना...!!!

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