Supriya Mishra   (Whitebird)
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Joined 29 October 2016


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Joined 29 October 2016
Supriya Mishra 30 JUN AT 23:15

कोई नहीं देता जिस नाव को किनारा
देखो एक दरिया उसे हिलौरे खिलाता है।

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 19 JUN AT 19:35

मैं, मुंबई और लोकडाउन।

(कैप्शन में पढ़ें)

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 19 JUN AT 1:25

उदासी जोंक है।
चिपक जाती है
किसी याद
किसी जगह
किसी गीत से।

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 16 JUN AT 12:29

मैं खुर्पाताल झील हूं
मुझे एक रंग नहीं भाता।
मैं ऊटी के ताड़ के जंगलों में कविताएं लिखती हूं।
और उन्हें बनारस के घाट पर पढ़ती हूं।
कूर्ग की पहाड़ों से बादलों में छलांग लगाती हूं।
अक्सा बीच की लहरों पर चढ़ाई करती हूं।

- सुप्रिया मिश्रा

(कविता अनुशीर्षक में)

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Supriya Mishra 14 JUN AT 23:34

एक दिन
इसमें पूरी तरह
काई जम जाएगी
और इंसान
यहीं बैठा रहेगा
कहने के लिए
' ये तालाब
कितना सुन्दर हुआ करता था'

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 30 MAY AT 1:37

.......

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Supriya Mishra 27 MAY AT 10:24

मेरे होंठो की मुस्कान को भेद कर
तुम्हारी नज़र कैसे जा पहुंची
सैंडल की पट्टियों में दबी
मेरे पैर की सबसे छोटी उंगली तक?
तुम्हारे टोकने से पहले
मुझे कभी एहसास नहीं हुआ
कि मुझे जो दर्द हो रहा है
वो मुझे नहीं होना चाहिए।
कि मेरी असली ऊंचाई
इस हील की ऊंचाई को
घटा कर ही नापी जा सकेगी।
कि चलने के लिए हमेशा
पैरों को तकलीफ देना जरूरी नहीं।
तुम जहां खरीद सकते थे
मेरे लिए सब कुछ,
पायल, बिछुए, झांझर
या फिर शायद कुछ नहीं भी।
वहां तुमने खरीदी
एक जोड़ी सादी,
आरामदायक चप्पल।
तुमने मेरे लिए
चलना आसान कर दिया।
उड़ना भी।

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 25 MAY AT 20:20

करोना पर दोहे
(कैप्शन में पढ़े)

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 20 APR AT 16:00

सच है
भीड़ की
कोई शक्ल नहीं होती।
आवाज़ नहीं होती।
ना ही होती है रीढ़।

घर में उठने वाले
चित्त और बुद्धि रहित
हजारों हाथ पैर
बाहर आ कर भीड़ कहलाते हैं।

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 19 APR AT 22:51

हम देर तक देखते
देखते रहे एक दूसरे को।
सिग्नल के खुलते ही
वो चलने लगा मेरे ज़हन में।
मैं थम गई उसकी उम्मीद के साथ।
हमने बांट ली
अपनी अपनी विकलांगता।

- सुप्रिया मिश्रा

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