Supriya Mishra   (Whitebird)
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Writer, Poet, Performer and sketch artist.

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Joined 29 October 2016


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Supriya Mishra 17 MINUTES AGO

चांद से पूछो कभी तो
रात की बातें सभी
उस रात की क्या बात थी जब
चांद को चोंटे लगी।

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 13 HOURS AGO

सामान्य दिखने वाली आपकी चाय में कितना नमक है, ये सिर्फ और सिर्फ आप जान सकते हैं। सामने खड़े व्यक्ति को को वो चाय तब तक साधारण ही लगेगी जब तक उसका स्वाद वो खुद ना चख ले।
ठीक उसी तरह आपके जीवन में आपकी खुशी, आपके गम, और आपकी तबियत का स्वाद सिर्फ आप जानते हैं।

डिप्रेशन सच है।
उतना ही सच, जितने मै और आप और हमारे शरीर में होने वाली कोई भी बीमारी।

इंसान जब एक बार खुद को तन्हा और बेबस महसूस करता है, और फिर करते ही जाता है तो मानो उसके हाथ से उसका सब कुछ छूटने लगता है। एक एक कर के सब कुछ छूटने लगता है।
खुश रहना कौन नहीं चाहता।
आपका ये कहना कि "खुश रहा करो" ठीक वैसा ही है "ख़ुश तो सब होते हैं, तुम्हें शायद महसूस करना नहीं आता"।

खैर, डिप्रेशन सच है।

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Supriya Mishra 7 NOV AT 19:18

चाहिए जो सुलझाए गहराइयां बवंडर की
समुंदर के मुसाफ़िर को किनारा नहीं चाहिए

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 2 NOV AT 21:36

मैं चाहती थी आंख मिलाए, हाथ फेरे
उसने मगर हाथ मिलाए, आंखें फेर ली

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 28 OCT AT 13:47

रूठ जाओ, रोक लो, जाने ना दिया करो
समझा करो मुझे, इतना ना समझा करो

- सुप्रिया मिश्रा

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Love is about fighting for love.

#love #life #lovequotes #hindishayari #pyar

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Supriya Mishra 28 OCT AT 1:20

....

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Supriya Mishra 17 OCT AT 14:37

कविताएं प्रेम की जो लिखी हैं चांद पे
सो आप चांद देखिए, सागर में छान के

- सुप्रिया मिश्रा

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करवाचौथ की सबको बधाई ❤️

#चांद #प्रेम #सागर #love #moon #festival #karvachauth

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Supriya Mishra 12 OCT AT 2:29

और क्या इससे बुरा तुम्हे आता नहीं है कुछ
दो पल को मिलते हो फिर लौट जाते हो

- सुप्रिया मिश्रा

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Supriya Mishra 9 OCT AT 18:02

ईश्वर की नज़र जब पहली बार
औरत के स्तनों पर पड़ी
तो प्रेरणा मिली पहाड़ बनाने की,
फल फूलों से लदे वृक्ष,
जड़ी बूटियां बनाने की।
उसने जब देखी औरत की कमर
तो रचना की
सुंदर घाटियों ओर वादियों की।
बन्द आंखे देख कर ग्लेशियर्स बनाए
और आंखे खुली तो झरने बहे।
जब होंठ थरथराए
तो ईश्वर ने बना दिए
सुंदर बाग बगीचे।
केशों से बनी लताएं।
आवाज़ सुन पंछी बनाए।
उसके गालों की त्वचा से मिट्टी बनी।
उसके हाथ पकड़े तो बनाए बादल,
पैर चूमे तो धरा बना दी।

औरत के पैरों को देख कर ख्याल आया
कि धरती का घूमते रहना आवश्यक है।

- सुप्रिया मिश्रा

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सृष्टि निर्माण

#औरत #संसार #पृथ्वी #life #poem

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Supriya Mishra 3 OCT AT 13:21

मिडिल क्लास का आदमी,
दफ़्तर जाते हुए निहारता है
रस्ते के दोनों तरफ़ उगे ऊंचे मकानों को।
चुराता है किसी से रंग,
किसी से दरवाज़े
किसी से खिड़कियां,
तो किसी के बरामदे का डिज़ाइन।
लौट कर वो जोड़ता है
दिन भर की चोरी
और फिर नापता है
दिन की कमाई के साथ।
चोरी का माल हमेशा महंगा रहता है।
अर्थराइटिस से पीड़ित
उसकी औरत बेलती है रोटियां
और सेंकती है ख़्वाब
एक झरोखेदार, बड़े रसोई घर के।
वो सोचते है घर की खिड़की
पूरब में नहीं खुलनी चाहिए।
मकान के किराए के बोझ तले
जब घुटने लगता है दम
तो सांसों कि तलाश में भागता आदमी
तोड़ बैठता है ताख़ पर रखी
गुल्लक।

- सुप्रिया मिश्रा

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