Subham Sourav  
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Joined 15 December 2019


Joined 15 December 2019
19 AUG 2023 AT 20:13

कभी कभी कश्तीयों का डूब जाना भी सही होता है,
क्योंकि हवाओं के बदलते रुख को सहना भी आना चाहिए।

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24 MAR 2023 AT 12:24

आज हवाओं ने भी जोड़ नहीं लगाया
पर फिर भी मन हिल गया है।
आज मौसम भी सुहाना सा है,
पर पता नहीं क्यों उमंग का रंग यादों में बदल गया है।
शायद यादों के अल्फाज़ तस्वीरों में बदल जाते हैं,
शायद इसलिए आज मुझे अपना बचपन याद आता गया,
कुछ हुआ नहीं पर फिर भी सबकुछ मेरे आंखों के सामने स्वतः आता गया।
हाँ, एक अध्याय खत्म जरूर हुआ है ;
अध्याय नहीं बचपन
बचपन नहीं बचपना........

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23 MAR 2023 AT 15:48

पता नहीं क्यों आज मुझे अपना बचपन याद आता गया,
कुछ हुआ नहीं पर फिर भी सबकुछ मेरे आंखों के सामने स्वतः आता गया।
हाँ, एक अध्याय खत्म हुआ है
अध्याय नहीं बचपन
बचपन नहीं बचपना

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10 NOV 2022 AT 19:02

पता नहीं किस मोड़ पर आ गया हूं,
जहाँ पहले ठहराव की ज़रूरत होती थी,
आज वह जरूरत भी बेफिजूल लगने लगी है।

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24 OCT 2022 AT 9:14

अंधकार को मिटाने के लिए,
अपने मन को द्रवित होने से बचाने के लिए,
स्वयं पर जो प्रश्न उठे है ; उनको स्वयं मिटाने के लिए,
अग्नि है ही काफ़ी है❗;
दीपक को ज्वलित कर पाने के लिए।

शुभ दीपावली ❗

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25 AUG 2022 AT 21:19

लहरों को समुद्र छिपा नहीं पाता है,
उजाले को अंधकार रोक नहीं पाता है।
मैं तो फिर भी मनुष्य हूं,
यह तिनके मात्र समस्या
मेरे अन्दर के ज्वलित ज्वाला को कैसे रोक लेगी❗

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21 AUG 2022 AT 21:36

मैं मुक्कमल करने को अपनी ख्वाहिश रास्ते पर निकल पड़ा हूं ,
अल्फाजों से चलने वाले शहर से दूर
अंगारों की ओर निकल पड़ा हूं।
छोटी-छोटी ख्वाहिशों को छोड़ ;
मैं उम्मीद के सहारे चल पड़ा हूं।
सफलता - असफलता के असमंजस से दूर
खुद को बनाने निकल पड़ा हूं।
मंजिल तो पता है बस
रास्ते की तलाश में निकल पड़ा हूं ❗


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21 AUG 2022 AT 21:15

ख्वाहिश थी तू मेरी,
जब तक आरज़ू करता था मैं।
अब तो जिद्द पर आ चुका हूं,
जुनून तो लाज़मी है।

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26 JUN 2022 AT 21:49

मैं बनना चाहता महान था,
पर अपनी आदतों से परेशान था।
शिखर पर पहुंच भी गया था मैं,
पर टिके रहना कहा आसान था।
शायद,खुद के बुने जाल में फंसता गया मैं,
शायद, चोंटी पर पहुचने की होड़ में ज़मी को भूल गया मैं।
पर
हारा नहीं हू आज भी; बस थोड़ा ठहर सा गया हूं,
रास्ता नहीं भूला हूं मैं, बस पत्थरों से उलझ सा गया हूं।
हाँ, चोट लगी है पैर में ; पर उठ आज भी सकता हूं।
पूर्ण नहीं अल्पविराम है यह, अंत नहीं शुरूआत है यह।
हारा नहीं हू आज भी; बस थोड़ा ठहर सा गया हूं।

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10 JUN 2022 AT 20:13

आग लगी थी बस्ती में, पानी ले कर मैं पहुचा था।
आग थी बहुत भयंकर, शायद बुझाने को कद मेरा ओछा था।
पर फिर भी मैं पहुचा था, पानी ले कर मैं पहुचा था।
आग दावानल में परिवर्तित होने जा रही थी,
अश्रु से अपने जलते घर को बुझाने की कोशिश अब भी जारी थी।
परंतु लोग ऐसे भी थे ;
जो अपने घर के जलने का इंतजार कर रहे थे,
पड़ोसी के जलते घर को देख कर अपने शरीर को गर्मसार कर रहे थे।
भूल गए थे वे की लपते आगे भी जाएंगी,
हो सकता है अगली बारी उनकी ही आएगी।।
आग लगी थी बस्ती में, पानी ले कर मैं पहुचा था ।

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