🌹सत्यराज🏷️ 🚬   (सत्यराज.ब्राह्मण 🏷️🚬)
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Joined 21 April 2021


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Joined 21 April 2021

फूलों पर पराग, पसर गया है जैसे,
नदी में शाम का सूरज, उतर गया है जैसे,
कोई आहिस्ता से हल्के हल्के,
दिल की दुनिया बदल गया है जैसे,
महक उट्ठी हैं धड़कने बरबस,
आंखों में कोई दरिया ठहर गया है जैसे,
तुम, मैं, हम, कुछ भी बांकी ना रहा,
कोई रिश्ता बिखर गया है जैसे ....

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साँस का क्या है?? हवा है, हवा हो जाएगी,
ज़िंदगी कभी थी ही नहीं, ऐसे दफा हो जाएगी,
रह जाएगी, एक कहानी, मेरी तुम्हारी,
और फिर वो भी, किताबों में सिमट जाएगी,
जो भी है, आज है, अभी है, जी लो,
सिमट जाओ मेरी बाहों में,
यही इक तरीका है,
ज़िंदगी आसान हो जाएगी....

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तलाश छोटी सी थी,
एक दोस्त सच्चा सा, प्यारा सा...
गुजर गया है साल, जाते जाते मुझे...
एक और इंतज़ार के सहारे करके...

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एक ख्वाहिश उछालकर हमने,
कितने लोगों से बुराई ली है।
खेर जाने दो, कोई बात नहीं,
दिल को दिल की बात सुनाई दी है।
तुम मेरे साथ, कदम दो कदम ना चलो,
दूर जाना है, मुझे रब ने रिहाई दी है।
रुक गए हैं, मेरे जज्बात एक जगह आके,
कुछ इस तरह तुमने अंगड़ाई ली है।
मेरे वादों पे खुद मुझको अब यकी ना रहा,
तेरी यादें तेरी चाहत, कोसिसे रोज़ भुलाई दी है।
एक ख्वाहिश उछलकर हमने,
कितने लोगों से बुराई ली है ....

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मैं क्या हूँ, ये वो जानता कैसे?
मैं खुदा हूँ, वो मानता कैसे??
खुद से बाहर जो निकल सका ना कभी,
घूम के शहर छानता कैसे??
उसने मुझको, उसी के साथ देखा होगा,
वर्ना मुझको पहचानता कैसे?
एक हद है, बेहद कुछ नहीं होता,
वर्ना मेरे सिवा कुछ और मांगता कैसे?
एक मैं ही तो हूँ, जो साथ हूँ मेरे,
दुश्मनी खुद से, मैं ठानता कैसे?
मैं क्या हूँ, ये वो जानता कैसे???

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बहुत मन है दोस्तों के साथ,
एक लंबे सफर पर निकल जाऊं।
हल्की बारिश में, हाफ शर्ट,
किसी शोख़ बदन से लिपट जाऊं।
रात हर रोज़, मुझे घर पे खींच लाती है,
वो चाहती है, मैं बस उसमें सिमट जाऊं।
चाय पीना तो एक, बहाना है,
आज उलझनों से कुछ सुलट जाऊं।
बहुत मन है दोस्तों के साथ,
एक लंबे सफर पर निकल जाऊं...

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बिखरती धूप सी लगतीं है, यादें तेरी,
कभी सुनहरी, कभी तपन की मानिंद हैं,
जुल्फ की छांव, नमीं होंठो की,
सीने से लगके, खोजते राहत,
साथ होंती या पास, तो बरसती चाहत,
दिल में अहसास के नस्तर, उतरने दो..
इतना बिखरे हैं तो अब,
तबियत से बिखरने दो....

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एक नाम ही था, सांस बनके, हममें बहता था..
एक नाम ही बांकी रहा, उल्फत के आखिर में....

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:: मुफ्त के बीज ::
दिल भी एक जमीन है।
जो मोहताज़ है,
मुलाकातों की बारिशों की,
बीज अहसासों के बिखेर दो साथी,
बूंदे मुस्कुराहटों सी छनक जाने दो,
तपन जीवन की धुंआं बनने दो,
गड़गड़ाने दो गीत होंठो पर,
कोई तो सुनके झूम उट्ठेगा,
प्रेम के पुष्प लहलहाने दो,
फसल हासिल है इस कहानी में,
मैं बांट दूँगा इसे भी लोगो को,
मुफ्त के बीज,
हिसाब क्या रखना...

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क्या जरूरी है? हम ऐसे मिलें,
जैसे, इस तरह मिलना ही,
मोहब्बत की मंजिल था...

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