सोनाली हूंका   (Sonali Hunka)
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Joined 23 February 2017


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Joined 23 February 2017

Travelling is not just escape or change from routine life, not just for entertainment or joy, it can teach you a lot, about the world outside and inside, about life and lessons, even about what you're;
& sometimes it's not just journey from one city to another but from a part of you to another you.

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मंज़िल जाने कैसी होगी
मगर रास्ते खूबसूरत लगते हैं,
ज़िंदगी फिर जाने कैसी हो,
चलो कुछ दूर साथ चलते हैं।

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यात्राएं करते हुए हम सिर्फ बाहर की दुनिया ही नहीं देखते बल्कि अपने अंदर की दुनिया भी देखते हैं।
संभवतः यात्राएं हमें अपने आप से मिलवाती हैं।

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तमाशे को तमाशा कह रहे हैं आप,
यूं ही तमाशबीनों से पंगा ले रहें हैं आप।

सच को बयां करने का चढ़ा है फितूर,
झूठों की बस्ती में सच बोल रहे हैं आप।

खलल पैदा कर रहे हैं सालों की रिवायत में,
आपको लगता है आवाज़ उठा रहे हैं आप।

पानी में रहकर मगर से बैर नहीं करते,
बड़े ही बे-एहतियात हो रहे हैं आप।

कहते हैं समझदार को इशारा काफी है,
सच-सच बताइए समझ तो रहे हैं न आप।

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Whether about love or lies, confession always gives feeling of satisfaction & courage to face the destiny. Satisfaction of being true, acceptance of Karm, no matter what comes next.

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ये भी दलाल, वो भी दलाल,
फिर कैसे किसी की मजाल।

भूखे हैं वो, भूखे हैं ये भी,
भूख का ही है सारा बवाल।

पेट भरे या पेटियां, मुद्दा है भरना,
फिर नियत पर इनकी कैसा सवाल।

आसान है किसी और पर उंगली उठाना,
बचाना हैं अपनी इज्जत दूसरे की उछाल।

पूछती है वो भी क्यों, कैसे, कब, कहां,
बस हो गया है अब उनका जीना मुहाल।

देखना हुकूमत अल्फ़ाज़ न छीन ले,
'बागी' तू अपनी कलम को सम्भाल।

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एक दुनिया है इर्द-गिर्द मेरे, एक ज़माना अंदर बसता है,
रास्ते तो नए हैं पर एक ख़्याल पुराना साथ मेरे चलता है।

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किनारा कर गई दुनिया या हमने किनारा कर लिया,
हमने रास्तों को अपने आप ही कांटो से भर लिया,
देखना है खोजता है कौन, किसको हमारी फ़िक्र है,
गुम हैं अभी बस कि राब्ता सबसे कुछ कम कर लिया।

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मन की जाने कौन, मन के लेख पढ़ पाए कौन,
आप ही आप में जूझे है पर मन पहचाने कौन?

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कहिए कुछ ऐसा जो मेरी सोच से मेल खाए,
अगर नहीं तो क्यों न आप काफ़िर कहे जाएं।

यूं तो असल में मसले बहुत है गुफ्तगू के लिए,
पर क्यों न बस आपकी बात पर उलझा जाए।

मुद्दा कीचड़ सा है उछला तो छीटें सब पर पड़ेंगे,
क्यों न सारी कालिख आप पर पोत दी जाए।

सियासत में जो उलझे तो बख़्शे नहीं जाओगे,
तो क्यों न इस सियासत का हिस्सा बना जाए।

ये आप तय करिए कि मेरी बात के मायने क्या हैं,
बागी की तो आदत है कुछ न कुछ लिखा जाए।

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