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शुभी पाराशर (शुभी पाराशर)

* Only change is permanent !
* Untold sacrifices never be counted !

* कृपया बिना अनुमति कोलाॅब ना करें !
* फाॅलो कर अनफाॅलो ना करें !
शुभी पाराशर 23 OCT 2018 AT 19:53

हँस जब-जब उड़ा, अकेला उड़ा,
देखो लाखों-करोड़ों का झमेला जुड़ा,
... हँस जब-जब उड़ा, अकेला उड़ा !!

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शुभी पाराशर 30 SEP 2018 AT 11:13

पति -पत्नी ही एक दूसरे के पूरक होते हैं, चाहे कितने भी 'चुटकुले' बने पर 👇 (सत्य घटना)

"जीवन भर तुम्हें ही चाहा"
पर अब सब छूट रहा है
हौले -हौले
उसमें तुम भी शामिल हो !
या कहूं की मैं ही सब कुछ छोड़ रहा हूँ
धीरे -धीरे
ये जानकर भी कि उसमें तुम भी छूट रही हो !
दर्द है कि तुम्हें छोड़ रहा हूँ
पर सब छूट जाएगा
खुशी भी है !

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शुभी पाराशर 16 SEP 2018 AT 18:16

अपनी नाकामियों से ज्यादा मशहूर हो गए हैं हम साहब
ज़रुरी तो नहीं चर्चे हर बार कामयाबी के ही हों !

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शुभी पाराशर 13 SEP 2018 AT 17:24

चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं
प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ।।

अनन्यभक्तिमानवं प्रचंडमुक्तिदायकं
नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकं ।।

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दुख होता है सुनकर कि 'लड़का' पैदा करने के लिए 'आज' भी 'दवाईयाँ' दी जाती हैं ,दूसरी बार 'बेटी' होने पर कुछ लोगों के चेहरे लटक जाते हैं !!

"पुकार"

क्यों नहीं चाहते मुझे पैदा करना,आखिर कसूर क्या है मेरा ?
मैं भी एक नन्हीं फूल सी कली, मुझसे पूछो तो क्या है मन मेरा ?
मुझे लड़कों से 'बराबरी' नहीं करना, ना ही अपने आप को 'तुलवाना' है, मैं कोई वस्तु नहीं !!
फिर क्यों दहेज से मेरी खरीद फरोख्त, क्यों उच्च खानदान में शादी का सपना ?
एक मौका तो दो, भरुँगी उड़ान पर पांव जमीन पर होंगे ! लाघूँगी क्षितिज पर कदम दहलीज़ पर होंगे !
ना झुकने दूंगी मान तुम्हारा, बनूंगी अभिमान, बुढ़ापे का सहारा ! क्यों बस चूल्हा चौका और शर्त !!
एक बार तो कहने दो मेरे भी दिल की बात, क्यों मनमानी, ये भेदभाव ?
कि नहीं हूँ मैं बोझ, बदलो ऐसी सोच !!






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शुभी पाराशर 16 AUG 2018 AT 20:25


वो सरल-सहज, चलते लघु पद !
वो अमर सत्य, कर्मों से 'अटल' !
थी मुश्किल मंजिल, वो राही पथिक !
अविचल,अविरल, ये बात गूंजी !
बातों के धनी, यही जीवन पूंजी,
जीवन पूंजी !!

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शुभी पाराशर 15 AUG 2018 AT 11:07

' उन आँखों के दो आंसू से सातो सागर हारे ..'


ये पंक्ति उन जाबांज शहीदों के परिवार के लिए जिन्होंने अपने निर्भीक सपूतों को खोया है !!
क्योंकि हम मना रहे थे जब दिवाली, वो खेल रहे थे होली !!

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हमें तो "टर" चाहिए !!
👇

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जिंदगी गणित का सवाल हो गई है,
साल दर साल बवाल हो गई है !!

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शुभी पाराशर 28 JUL 2018 AT 17:18

अनजान शहर, मुश्किल सी डगर, चली लहर-लहर,
बड़ा नगर-नगर, आफत हर पल, पर चल पग-पग
नहीं सरल-सरल, मुड़ना ना मगर, रूके ना सफर,
ये राह जलन, तू बन जा सहन, थकना है मना पर
धूमिल मंजर, हर कदम-कदम, ये पथ कंकर,
हो जा तू मलंग, कर मनन-मनन, बनके हाँ सहज
हर पहर-पहर, बन तू कहर-कहर,
पीले ये भी जहर, तुझमें शंकर !!




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