शुभी पाराशर   (शुभी पाराशर)
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❤ पुराने ख़यालातों वाली एक नयी सी लड़की!!
Joined 4 January 2018


❤ पुराने ख़यालातों वाली एक नयी सी लड़की!!
Joined 4 January 2018


"एक रोज चहकते कदमों से, हर पल घुमड़ते प्रश्नों से,
बेटी ने फिर एक उत्तर माँगा,मैं हो गई पल भर निरुत्तर,
तूने कैसा ये सवाल दागा".!?

बेटी: कूढे़-कंकर के ढेरों से, वो खून से लिपटे चेहरों में, हर रोज क्यों बेटी मिलती है, जो तिल तिल कर यूँ जलती है?

माँ: जिस कोख से पुरूष को जन्म दिया, उसने ही नारी विध्वंस किया, जब तक अबला कहलाएगी तू, इस शीश की भेंट चढा़एगी तू, ये निर्मम,निर्मोही इंसान, समझेगा अपने जूतों की शान।

बेटी: जिस देश में नारी पूजित थी, जहाँ दुर्गा, काली, सीता थी, उस देश में दुष्कर्मों की बातें हैं, बेटी को जहाँ सब बोझ बताते..?

माँ: तू अलख जगा अपने तन में, तुझमें गौरी सी करुणा है, तू ही लक्ष्मी,मनमीता है, तू गीता,नरसंहारिनी है, तू भव्या, तू महारानी है।

बेटी: क्या यही सीख थी वीरों की, जहाँ मिट्टी है सपूतों की? इस राष्ट्र का ये क्या हाल किया, दरिंदों ने क्यों विश्वासघात किया..?

माँ: तू सबल बन कर प्रतिशोध, तू है ज्वाला, काली का रुप, तुझमें वो सारी क्षमता है, जहाँ हुए हैं गांधी, मुक्तिबोध।।।

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वादा निभाने चले हो तो सोच लो,
इस रास्ते में एक समाज भी आएगा !

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"बेटी"

पूरा पढ़े़ं अनुशीर्षक में ..

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'नन्हा बचपन'

मेमसाब के जाते ही संभालने लगती है उसके बच्चे को,
ना जाने वो खुद इतनी बड़ी कब हो चली है ।
खाते देख उसे (बच्चे को) काजू-पिस्ता, मन तो उसका भी ललचाता है,
पर घर में बीमार माँ का बिस्तर सीने में तैर जाता है।
पढ़ना-लिखना तो उसे भी भाता है पर, जिम्मेदारी तले ये शौक भी दब जाता है।
बर्तन, झाडू हो या कपड़े, हर काम वो कर लेती है,
अपनी आँखों के कोनों से, झरोखे भी तो रोक लेती है।
छोटी-छोटी गलतियों पर अब उसे रोना नहीं आता है, मेमसाब के डाँटने पर मुँह बनाना कहाँ आता है।
कभी झूठन से, कभी बेगार से पेट भरते देखा है,
खिलौने छोड़, लोगों को पानी पिलाते देखा है,
हाँ, मैंने एक बचपन को यूँ मरते देखा है।।
गिनती पूरी आती नहीं पर, हिसाब बराबर कर लेती है।
पाई-पाई जोड़ कर ही तो, छोटे भाई को टाॅफ़ी दिला पाती है।
कभी मेस में डिब्बे रखते, जीभ तो अक्सर ललचाती है लेकिन, 'दो दिन'और सोच उसकी चाल कहाँ रुक पाती है।
तड़कती धूप में, गुड़गुड़ाती भूख में, एक बचपन तपते देखा है, उसको तिल-तिल तड़पते देखा है।
अपनी स्याही से मैंने ऐसा बचपन उकरते देखा है ,
हाँ, मैंने एक बचपन ऐसा भी देखा है।।।

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ज़िम्मेदारियों की बरसाती ओढ़ निकलते हैं..
वरना ख़्याल तो अब भी आता है बारिशों में भीगने का!!!

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मंज़िलें खींच लाती हैं घर से दूर,
वरना अपने मुहल्ले की तंग गलियाँ क्या कम थीं..!

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ना हालात होंगे, ना इंसान
... गर सपने बुने हैं तो, साकार तुझे ही करने होंगे !!

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अपने तरकशों पर भरोसा रखना, गिराने वाले बहुत मिलेंगे।
हर मुश्किल को पार करना , सजाने वाले तो सौ मिलेंगे।

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'बुढ़ापा'

बंदे तो हम भी काम के थे पर,
अब जरूरतों का पहाड़ "उन्हें" बोझ लगने लगा है !

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भीड़ तो बहुत लगी थी तमाशा देखने,
हमनें भी मुकद्दर का हवाला दे बाजी पलट ली..

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