Shubhankar Sharma   (Shubhankar Thinks)
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Joined 17 November 2017


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Joined 17 November 2017
Shubhankar Sharma 30 NOV AT 21:44

बेशक पढ़ लिए हैं वो इल्मी किताबें बहुतायत में,
क्या फ़ायदा गर बातों में अब भी सरलता नहीं है|

कोशिश कर रहा है इन्सां पैरों से आसमाँ तक चढ़ने की,
बिना पर की पैदाइश है इसलिए कोई सफलता नहीं है|

पड़ती है तो पड़ जाने दो किसी पर मार वक़्त की,
ठोकर खाने से पहले कोई भी संभलता नहीं है|

मत करो गुज़ारिश किसी से बदल जाने की,
बिना खुदगर्ज़ी कोई यूँ ही बदलता नहीं है|

कुछ लोग रहते हैं ऐसे गुमान में अपने,
जिन्हें लगता है की सूरज कभी ढ़लता नहीं है|

तुम अकेले चलो, किसी को खींचा मत करो साथ में,
ऐसे जबरदस्ती कोई किसी के भी साथ चलता नहीं है|

थम जाता है सब कुछ मुश्क़िल घड़ी में,
तब वक़्त का आँकड़ा भी ठीक से चलता नहीं|

कुछ लोग अँधेरे में बेवज़ह इतने हताश हुए जाते हैं,
क्यों लग रहा है उनको कि कभी दिन निकलता नहीं है|

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Shubhankar Sharma 27 NOV AT 11:15

खेल में सब अपने अपने पासे फेंक रहे हैं,
कुछ तसल्ली बख़्श बस तमाशे देख रहे हैं।

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Shubhankar Sharma 20 NOV AT 6:55

नफ़ा नुक़सान सब जिंदगी के हिस्से हैं,
हादसे हुए हैं तभी तो सुनाने के लिए किस्से हैं|

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Shubhankar Sharma 15 NOV AT 18:52

कहीं ख़ुद सीख रहे हैं तो कहीं इल्म बांट रहे हैं,
वही पुराने अंदाज़ में वक़्त-ए-जिंदगी काट रहे हैं।

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Shubhankar Sharma 14 NOV AT 19:16

गर इर्द गिर्द की अक्लें रखी हो हवालातों में,
तो मत उलझिए ज़वाब और सवालतों में।

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Shubhankar Sharma 13 NOV AT 21:05

मचलता है गर मचलने दो, फिसलता है तो फिसलने दो,
जो गिरा है अपनी गलती से, उसे ख़ुद से ही संभलने दो।

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Shubhankar Sharma 12 NOV AT 7:13

मेरी नजरें टिकी हैं दरख़्त के सतर्क खड़े तने पर,
हौसले टूटे नहीं हैं पत्ते गिर जाने के बाद भी।

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Shubhankar Sharma 6 NOV AT 6:49

बड़ा मुश्किल है राह पर सब्र रखकर के चलना,
वक़्त कीमत अदा करेगा, इस में कोई दो राय नहीं।

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Shubhankar Sharma 2 NOV AT 19:09

हवाऐं ज़हरीली हुई शहर में, धुंध कालिख सी छाई है,
आखिर कुदरत हमारे कुकर्मों को कब तक छुपाए रखती?

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Shubhankar Sharma 2 NOV AT 19:01

कम बोलने का आलम ये है कि महफ़िल में जाने से बचता हूं,
कि बेकार में दो चार किस्से सुनाने पड़ गए तो क्या होगा?

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