Shubhang Dimri   ('शुभी')
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कागज़ पे कलम से ख़ुद को बयां करते हैं,
वो समझते हैं हम शब्दों का कारोबार करते हैं.
Joined 7 June 2017


कागज़ पे कलम से ख़ुद को बयां करते हैं,
वो समझते हैं हम शब्दों का कारोबार करते हैं.
Joined 7 June 2017
Shubhang Dimri 2 HOURS AGO

छोड़ जाए जब चिड़िया बूढ़ी सी शाखों को,
पूछो नशेमन से उसपे क्या क्या गुज़रती है।

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Shubhang Dimri 22 HOURS AGO

सुनो! हूँ असीर मैं अपने ख़यालों का,
जला देता हूँ सब, उफ़ भी नहीं करता।

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असीर- prisoner

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Shubhang Dimri 14 APR AT 0:15

जो मुझ पे बीती है, ना तुझे बताता हूँ,
ग़ज़ल का तुझे एक मिसरा सुनाता हूँ।

लफ़्ज़ों से तुम कभी जज़्बातों में उतरो,
आओ तुम्हें ढहता एक मकाँ दिखाता हूँ।

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Shubhang Dimri 13 APR AT 12:11

एक सुराही, ग़म जिस में लोगों के रह जाते हैं,
एक दरिया जिस में रस्ते सब मिल जाते हैं।

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Shubhang Dimri 13 APR AT 10:16

इमारतों का जज़ीरा नज़र आता है इधर,
समन्दर में जाने कितने ख़्वाब गए होंगे।

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Shubhang Dimri 10 APR AT 15:07

बुझा के दीया कैसे ख़ुश रहेगा,
वो ग़ुरूर है, ख़ुद को हवा कहेगा।

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Shubhang Dimri 6 APR AT 10:59

दीवारों पे चढ़ गया है रंग राख़ का,
ये मकाँ है देखो कुछ कुछ मज़ार सा।

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Shubhang Dimri 1 APR AT 0:37

देखो ज़मीर को अर्थी पे लिटाया जा रहा है
क्या खूब चुनाव का डंका बजाया जा रहा है

हाँ इंसानियत मर हो गयी है ख़ाक लेकिन
वहाँ आज एक घर और जलाया जा रहा है

यहाँ शहर कितने फूँके हैं नफ़रत की चाह ने
गज़ब है आग को मुजरिम बताया जा रहा है

ये पूछ तू हवाओं से, मैंने तूफ़ानों को रोका है,
मेरे ही घर मुझे काफ़िर बुलाया जा रहा है।

सियासी ज़द में है ये रौशनाई आ गयी,
लो अब अंधेरों को ख़ुदा बनाया जा रहा है।

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Shubhang Dimri 26 MAR AT 10:28

नज़दीकियाँ मुझे डराती बहुत हैं,
कभी बेहद क़रीब कोई रहा होगा।

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Shubhang Dimri 25 MAR AT 12:43

ये दीवारें जो मुझे रखती हैं सुरक्षित,
शायद यही हैं उत्तरदायी मुझे स्वयं तक सीमित रखने में।
ये मुझे धूल से बचाती तो हैं,
मगर यही मुझे बाँध देती हैं एक संकीर्ण सोच के दायरे में,
और रोक देती है मेरी उन्नती और मेरे विकास को।
ये दीवारें मेरे सपनों को और मेरे विचारों को सहेज कर तो रखती है,
परन्तु ये इन्हें बढ़ने भी नहीं देती,
और धीरे धीरे से विक्षिप्त कर देती हैं मुझे।
मैं दीवारों को दोष देता हूँ,
कोसता हूँ इन्हें की ये मेरे जीवन को निरर्थक कर रहीं हैं,
कदापि मैं भूल जाता हूँ कि ये दीवारें महत्वपूर्ण हैं,
महत्वपूर्ण हैं मेरे मन की सुरक्षा के लिए।
आवश्यकता दीवारों को ढहाने की नहीं है,
आवश्यकता है इन दीवारों पे खिड़कियाँ बनाने की।

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