Shubhang Dimri   ('शुभी')
1.4k Followers · 185 Following

कागज़ पे कलम से ख़ुद को बयां करते हैं,
वो समझते हैं हम शब्दों का कारोबार करते हैं.
Joined 7 June 2017


कागज़ पे कलम से ख़ुद को बयां करते हैं,
वो समझते हैं हम शब्दों का कारोबार करते हैं.
Joined 7 June 2017
Shubhang Dimri YESTERDAY AT 21:04

सुकून मिरा छीन कर ग़ज़ल कह देता है,
मिरा दिल भी कभी मुझे तन्हा कर देता है।

-


13 likes
Shubhang Dimri 15 AUG AT 10:48

कि मिट्टी से उठती है फिर ख़ुश्बू वही सौंधी,
कोई उठता है मज़हबी दीवारें तोड़ देता है।

-


16 likes
Shubhang Dimri 12 AUG AT 3:24

बड़ी मशक्कत कर अँधेरों से उठता है आदमी,
फिर एक दीया बुझा के अँधेरों में समा जाता है।

-


बस कुछ इतना ही है आदमी।

21 likes
Shubhang Dimri 9 AUG AT 5:06

कामिल सा लगे है वो चाँद आजकल,
कहीं कोई दुल्हन का घूंघट उठाता है।

-


17 likes
Shubhang Dimri 3 AUG AT 17:31

मेरा सच एक भयावह मंज़र है,
एक खूनी जिसके हाथों में खंजर है।

-


26 likes · 2 comments
Shubhang Dimri 28 JUL AT 20:34

शायरी को आज़माना भी ज़रूरी है,
ज़िन्दगी में टूट जाना भी ज़रूरी है।

किसी के घर से निकलो, काफ़ी नहीं,
वो किर्दार छोड़ आना भी ज़रूरी है।

माना के लफ़्ज़ों से होता है दर्द बयान,
निगाहों से आँसू बहाना भी ज़रूरी है।

हवा का रुख बदल उजाले नहीं आते,
परिचय तेल का होना भी ज़रूरी है।

मुहब्बत है रिश्ता महसूस करने का,
नहीं जिस्मों का मिलना भी ज़रूरी है।

चाँद-सूरज ये सिखा देते हैं, उठे कोई
तो किसी का ढलना भी ज़रूरी है।

ज़िन्दगी में कामिल मंज़िल नहीं आती,
मगर रस्तों पे चलना भी ज़रूरी है।

बहुत लंबी उड़ान सरहदें लांघ देती हैं,
कभी परिंदों का गिरना भी ज़रूरी है।

घर में हों दरीचे इतना ही नहीं काफ़ी,
जीने को एक आईना भी ज़रूरी है।

-


14 likes · 2 comments
Shubhang Dimri 28 JUL AT 2:07

फैला इधर उधर सब जंगल है,
तेरे अन्दर मेरे अन्दर सब जंगल है।

अब तू इस बस्ती में इंसान ना ढूँढ,
क्या मुनव्वर क्या दिगंबर, सब जंगल है।

चार दीवारें, एक दरीचा और एक छत,
है ये जो खण्डहर सब जंगल है।

ये तेज़ हवाएँ दीया बुझाने आ जाती हैं,
कौन क़लंदर कौन सिकंदर, सब जंगल है।

एक क़तरा ही काफ़ी है बग़ावत के लिए,
कैसा दरिया, क्या समंदर, सब जंगल है।

-


22 likes · 3 comments
Shubhang Dimri 27 JUL AT 20:53

इतनी नफ़रत लिए जो जीते हैं
क्या वाकई में वो जीते हैं

क्यों औरों को देते हैं बद्दुआ
ज़हर ये वो ख़ुद ही तो पीते हैं

सोचो तो ज़िन्दगी कुछ भी नहीं
बस उलझे हुए जूतों के फीते हैं

बरसती है छत तो रो देते हैं
दीवारों पे आंसुओं के छींटे हैं

है उजालों को हासिल ज़ुबाँ यहाँ
अँधेरे हैं जो होंठों को सीते हैं

-


25 likes · 3 comments
Shubhang Dimri 26 JUL AT 14:46

फटा कुर्ता, घिसी चप्पल, ख़्वाब इक निगाहों में,
ऐ ख़ुदा मेरे वालिद ने बस मेरे सपने कमाए हैं।

-


25 likes · 2 comments · 1 share
Shubhang Dimri 25 JUL AT 4:29

मुफ़लिसी में भी दरिया दरिया सा लगता है,
समन्दर है जो हर दफ़ा प्यासा सा लगता है।

मिरी आँखों में रहे उस इक किरदार की तरह,
देखो ये आँसू भी कितना तन्हा सा लगता है।

जब कभी उठ जाती है इस मिट्टी से ख़ुश्बू,
मुल्क में खड़ी दीवारों को झटका सा लगता है।

कभी हक़ीक़त को रातों पे ऐतबार नहीं रहता,
गवाहों का सच भी एक मलबा सा लगता है।

बीती यादों को करके याद वो रोता बहुत है,
ये शोर भी सन्नाटे में कैसा तन्हा सा लगता है।

-


20 likes · 1 comments

Fetching Shubhang Dimri Quotes

YQ_Launcher Write your own quotes on YourQuote app
Open App