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Shubhang Dimri ('शुभी')

कागज़ पे कलम से ख़ुद को बयां करते हैं,
वो समझते हैं हम शब्दों का कारोबार करते हैं.
Shubhang Dimri 19 HOURS AGO

साँसों की आवा-जाही सी थी वो,
इसलिए शायद मिरी तबाही थी वो।

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एक ख़याल

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Shubhang Dimri 17 FEB AT 22:58

उसकी अना थी जो थाम गयी आँसू,
बिछड़ते वक़्त वर्ना वो रोयी बहुत थी।

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Shubhang Dimri 17 FEB AT 15:06

क्या देखा है तुमने वो घनघोर कोहरा?
कोहरा जो भीतर सारा जहान समेटे होता है,
वो जहान जो हो जाता है ओझल निगाहों से।
दूर से देखो तो बस कोहरा ही कोहरा,
क़रीब जाओ तो नज़र आता है,
नज़र आता है इस जहान का अकेलापन,
और नज़र आता है बिखरे हुए रिश्तों का समूह।
वो कोहरा सबको सचेत करता है,
और दौड़ने की रफ़्तार थाम लेता है।
पर फ़िर निकलती है धूप,
जो निगल जाती है कोहरे को,
और एक बार फ़िर इंसान दौड़ पड़ता है,
दौड़ पड़ता है उस निरर्थक दुनिया की ओर,
और खो देता है ख़ुद को कहीं अपने ही भीतर।

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Shubhang Dimri 7 FEB AT 2:36

गुफ़ा
(पूरी रचना अनुशीर्षक में)

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Shubhang Dimri 1 FEB AT 9:23

रात, ख़्वाब, याद सब तेरे दीदार से निखर से गए,
फ़िर हम सिमटे ख़ुद ही में और बिखर से गए।

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Shubhang Dimri 29 JAN AT 23:06

घुप, घनघोर, शांत, स्थिर ,
मैं अंधेरा हूँ।
वो अंधेरा जो उजाले को निगल जाता हूँ,
निगल जाता हूँ सारे नक़ाब।
मेरे अन्दर समाया है सत्य,
भयावह घिनौना सा सत्य!
मैं कुछ बोलता नहीं हूँ,
परन्तु अतिरेक होने पर चीख उठता हूँ,
और फिर चीर देता हूँ सभी किरदार!
शांति को भेदती एक अराजकता उभरती है,
सभी सोए ज़मीर जाग उठते हैं।
परन्तु फिर आती है भोर,
और मैं समा जाता हूँ उन्ही किरदारों में।
पुनः शुरू होता है इंतज़ार उस अंधेरे का!

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Shubhang Dimri 29 JAN AT 10:18

ये शोर इस शहर का बताता है,
सन्नाटे का कहीं दम घुटा जाता है।

तुम आओ यार मिरी बाहों में रहो,
ऐसे तो वर्ना ये वक़्त गुज़र जाता है।

हम भी चलो एक घर बना लेते हैं।
ये दर-ओ-दीवार मुझे बड़ा सताता है।

गुनाह आफ़ताब के कुछ तो रहे होंगे,
यूँ ही नहीं वो चाँद से चहरा छुपाता है।

ये सौगात मुझ को तूने अच्छी अता की,
कर के मिरा क़त्ल मुझे मुजरिम बताता है।

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Shubhang Dimri 24 JAN AT 19:30

समन्दर की प्यास बुझा के दरिया ने,
पूछा बस यही कि ये ग़ुरूर कैसा है।

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Shubhang Dimri 22 JAN AT 22:36

रक्खा था हवाओं से दीया बचा के,
नमी ले गयी सब रोशनी चुरा के।

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Shubhang Dimri 22 JAN AT 0:38

ज़िन्दगी गुज़रती है साँसों की उधारी में,
ये मौत कम्बख़्त जान ले जाती है।

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