हो तुम भी यहीं कहीं, हूं मैं भी यहीं खड़ा
ना भूलती तुम भूल कोई, है मुझे भी सब याद बड़ा
पर माफ़ी मांगते नहीं हम-तुम, क्यों इतना ये ग़ुरुर ज़रुरी है??
ऐसी भी क्या मजबूरी है??
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है तेरे-मेरे दरमियान
ख़ामोशियां कुछ और बाकी
कुछ तेरे होंठों का मलाल है
है कुछ मेरी आंखों का डूबना बाकी
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मुझसे भी ज्यादा अब कोई मुझसे परेशान होने लगा है
शायद मेरी ज़िन्दगी अब सिर्फ मेरी नहीं रही-
कीमत हो कोई तो मुझको बता तू
मैं हो जाऊं तुझ पे हो मुझ पे फना तू
लिख दूं मैं पूरा तो समझे ज़रा तू
हूं ख़ाली मैं खुद में हो मुझ से भरा तू-
चलो आज एक सौदे को परख लेते हैं
तुम नींद रख लो हम रात रख लेते हैं-
महबूब को चांद बुलाने की रीत पुरानी है
वो नज़र में आता है नसीब में नहीं-
जुनून तो मुझे बस मेरे सपनों का है
मोहब्बत तो उन फरेबियो का दिल बहलाने को करता हूं-
ना दौलत से चूर
ना रुतबे में मगरूर रहना है
मुझे तो बस मेरी कहानी में मशहूर रहना है
जो ना ठहर सका मैं लम्बे समय तक
तो नाराज़ मत होना
मुझे यादों में भी बेकसूर रहना है
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बड़े ही प्यार से लिखी गई थी
कहानी मेरी हर शाम कि
गुनहगार तो मैं था
जो दूसरों के सितारे गिनता रहा-
कुछ कहानियों का अंजाम सब से हसीं तब ही होता है
जब उन्हें बीच रास्ते छोड़ दिया जाए
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