shraddha pawar   (sp)
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Joined 31 January 2017


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8 NOV AT 18:38


मेरा ख़ुल्द फिर होगा
इसी हिकायत में,    
ठीक वैसे जैसा तुमने चाहा था|  
तुम्हारी टीस और तशरीह, 
एक लहज़े मे समेटे हुए  
वस्ल से परे
हर इक शिकस्त के पार
फिर कभी क़ुर्बत होगी;

इसी मशिय्यत में
कि इस बार
न मेरी हैसियत अलग होगी,
और ना ही तहज़ीब|

एक जो मैं हो न पायी -  
एक जो मैं हो न पाऊँगी कभी भी -
एक जो होने नहीं देगी ये कायनात
हमें।  

इस बार हालात और आजाऱ,
दोनों तुम्हारे होंगे|  
तकदीर की नाकामियों पर बैठे
तकलीफ की तहों से
निकाल लाऊंगी पूरी जिंदगी;

मेरा ख़ुल्द फिर होगा,
इसी हिकायत में,  

मगर तुम किस नाम से मिलोगे?

-


31 OCT AT 13:44

My atoms
are the untold waves
of revolution,
an assassination,
sprouted from the valiant graves
preserved in a deathlike eternity.
Until there's no trace
of a seed,
a bruiser,
or the last ray of dusk.

Beneath these fossils'
encircling memoir;
I'd be damned,
if they find any bloodshed
and name it anything but
beautiful.

-


11 AUG AT 20:01

सिर्फ लिफाफों में सिमटी नहीं थी
मेरी अनगिनत ख्वाहिशें,
वो कूड़े में फेके हुए कागज़
एक दफा उठाकर तो देखते|

-


3 AUG AT 15:56

𝑅𝒶𝓀𝒽𝒾 sent,
money received.
An aspirant psychiatrist,
learning to untie the threads
of a delusional society.
Not a single mind could recognize,
for how long you had been 𝒔𝒂𝒗𝒊𝒏𝒈—
me.

-


18 JUL AT 17:57

There are those
among us;
who upon gripping pain
sink into darker holes,
rather soak up higher frequencies
refract wavelengths and
reflect on how we
used to be.

Every so often;
it's okay to end
without having to begin,
anything at all.

-


3 JUN AT 22:00

Who was I,
if not the aftermath
of your sinfulness?
What are you,
if not a mouth full of
desires drooling down?
Human. Death. ‘Hate’ –
even your sacred book says,
when God lost his own face –
he was given mine.

( Continued in caption )

-


20 MAY AT 22:35


हम जीतने सभ्य होते है
उतने ही बेपरवाह|

अपनी नजात को सिफर तक
खींचने के प्रयास में जो निर्बल है
उन्हें हमारी तरह सभ्य होना है,
और बेपरवाह भी|

दिन-रात एक ही जैसे कदमों को
ढौलता हुआ ये रास्ता
असभ्यता की हर्फ़ को समझ नहीं पा रहा|

एक खाली मुठ्ठी और
रियासत के नाम पर
सिर्फ अर्श की रग़बत|

मानो घर खड़ा,
मगर नींव गायब हो|

इस बार अंधेरे की चौख़ट पर,
बेपरवाह-से निर्बल
उन असभ्यताओं से भरी
रूहों को नीलाम कर रहे होंगे शायद|  


क्यूंकि एक हत्यारा शहर
अपनी ही रौशनी में मशग़ूल,

सभ्यता के क़ब्रिस्तान पे
कई अर्सो से चल ही तो रहा है|

-


18 APR AT 22:38

न जाने कितने अर्से बीत गए
तुम्हारी चुप्पी को सरलता से सुने हुए
जैसे दिन का शोर रात के सन्नाटों से
वक़्त छीनने की आस में    
गुजरता-सा जा रहा हो|

बदमिज़ाज दुनिया नहीं समझ सकती
इस बिखरते स्याही में लिपटे हुए लफ्ज़ो को
कह देती है 'पागल' जब पढ़ती है
के तुम आज भी एक मौन छोड़ जाते हो
अनसुने भावनाओं के दहलीज़ पर|

लोगों का क्या है?
चाय की चुस्कियों के साथ भूल जाएंगे
रात के सन्नाटों में चीख रहा था कोई
मत मानना इन अफ़वाहों को|

तुम्हारे चुप्पी से परे
अब और भी किस्से आस लगाए बैठे है 
वक़्त की दहलीज़ के उस पार,

पुकार लेना किसी दिन|

-


21 MAR AT 15:53

Be someone
who scorched milk
once.

A therapist once told me

to speak out loud
about you. 

I said, i would 
write it out, honey. 

As if you were 
a prayer. 

Or a sin to commit. 

Undesired,
unbeckoned.

Pierced,
into every page.

Your flare
guides my wrist, 

as I write this, 
even now. 

-


17 FEB AT 0:19

नशेबाज़ तो हम दोनों भी थे,
उसने चंद बूंदो में गालियाँ समेट ली,
और मैंने बिखरे हुए स्याहीओं में कहानी|

-


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