पिछले महीनों ऐसा लगा था कि
मेरे रुह का टुकड़ा मेरे जिस्म में जुड़ गया हो
शरीर का हर अंग दर्द में था, और मैं चौदहवें आसमान पर
तुम दो जो थे,
हमारे ख्वाब, हमारी खुशी, हमारे रुह के टुकड़े,
हर बितता हफ्ता, ख्वाब से हक़ीक़त बनते
तुम, मैं और हमारा "हम"
हम, दो नहीं, तीन नहीं, "हम चार"
तुमने मुझे बताया कि कैसे
एक स्त्री मन से खुश हो सकती है
भूखे पेट, शारीरिक कष्ट में भी,
और फिर सारी खुशियां, अपने साथ
मुझे तोड़ते हुए, मुझसे तोड़ कर ले गए,
और मुझे छोड़ गए,
बंजर, टूटा, रीसता ...-
Does pain makes you numb
Or just stronger?
Some people might say numb
Or some stronger.
Depends on whether they are dramatic
Or just simply Stronger.-
I deem myself writer,
Yet I am at lost of words,
Only love, fear and pain can do that
and right now I am afraid and in pain
for one of the person I love.
I have a list of people you know.
I think myself as a nucleus
And I have KLM shells
I am afraid that I will lose
One of my closest 3 shells
You know that makes an atom unstable
I believe I am a nucleus remember,
I have protron, neutrons and electrons
My protrons attract and hold my shells,
Like gravity holds us standing.
But, I fear...
Because I know losing any of my shell will make me unstable.
and instability invoke fear, fear gives pain,
And yet, I am depositing more and more protrons in myself
So that my shell will not leave me.
So that I, with all my will never let my shell go.-
A quote a confessions and a request.
Please pray for Isvi to get better.
She is one of the best human being and she deserves a chance to grow old and become an irritated old women with a cute husband lots of kids and grandkids.-
Pain and fear goes hand in hand,
I fear that I'll lose the sister I gained
I am in pain cause she is in pain,
With all that things on karma
and people talking about
getting what they deserve
that kid deserves love and happiness
yet, she is in ICU fighting for her life.
We are here, outside the door of hospital
unable to meet her, weeping silently
Praying for her to get well...-
मैंने बहुत सुना है "कर्म" के बारे में,
लोगों से, कहावतों में और कहानियों में
सुना है कि कर्म का फल मिलता है, और
धर्म भी गलत कर्म साफ नहीं कर सकता,
पर क्या इंसान कर्म का खेल समझ पाया है?
या फिर अपने और औरों के कर्म का लेखा जोखा
रखने की नाकाम कोशिश करता रहता हैं,
खैर "जस करनी तस भोग्य विधाता"-
जब सब से दोस्ती हो जाती थी, तब मां कहती थी,
"इतने दोस्त नही बनाते की उन्ही में लगे रहो,"
तब उन्होंने या मैंने ये कहां सोचा था,
कि कभी सालों में भी नई दोस्ती नहीं होगी,
और वो पूराने दोस्त भी, धीरे धीरे दूर हो जाएंगे,
अब दूरियों का कारण भी कोई ऐतीहासिक नहीं,
बस अपने पति, पत्नी और बच्चों में व्यस्त हो कर
जन्मदिन, सालगिरह और कोशिश करना भूलते रहे
अब दोस्ती में गिनती भी तो रख नहीं सकते,
किसे मालूम किसने कितने फोन किये, किसने नहीं
रिश्ता अब भी है, बस करने कोकोई बात बांकी नहीं
और अब मां कहती हैं, "कोई नया दोस्त क्यों नहीं बनाती"-
सुनो! नाम में क्या रक्खा है,
मेरे नाम के साथ नाम मोहम्मद का जुरा हो
दूर्गा का, बुद्ध का, या ईशा मसीह का
मैंने नाम को रौशन करने की बात की है,
और सूर्य तो अपना प्रकाश सबको देता है,
किसी का नाम नहीं पूछता
ना हीं वो पूछता है,
पिता का नाम, जाती ना ज्ञात होने पर
और फिर ये भी तो सच है कि
नाम तो शैतानों के भी राम और रहीम होते हैं,
फिर, नाम में क्या रक्खा है?-
You know it's hard to reconnect.
It takes time, effort
and most of all lots of patience
you have to take first step
It's the toughest thing,
so it must be your baby steps,
and then continue be persistent
and you don't have to stop.
if you will, you'll have to restart all over.
you know yourself, right?
you are tough to please.
so, keep trying to reconnect.
TO RECONNECT WITH YOURSELF...-