रिश्तों की अग्नि में ...
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मैं लकड़ी होता
और कोई मुझे जलाता,
तो जलकर
मैं इक आग हो जाता,
डाल देता कोई
उन जलते हुये अंगारों पर,
कुछ बूंदे पानी की
तो कोयला हो जाता,
कोयले को जलाता
फिर कोई एक बार तो,
इस बार मैं जलकर
राख हो जाता !
लेकिन इंसान हूं
रिश्तों की अग्नि में
जाने कितनी बार
जला हूं मैं, बुझा हूं मैं, भीगा भी हूं मैं
लेकिन जलकर
अभी राख नहीं हुआ
कि मिल सकूं माटी में बनके माटी !!!!-
वक़्त तो बड़ा ही व्यस्त है
ज़िन्दगी भी अब
इसकी अभ्यस्त है
नित-नई चुनौतियों की
ओढ़कर दुशाला
चलते-चलते
सोचता कोई है ..
जो मन की देहरी को
पार करने से पहले
दस्तक़ देकर,
पूछ ले हाल
मनमर्जियों की लग़ाम
पकड़ ले कसकर !
…
तुम्हें पता है न
विदा के वक़्त की मुस्कान
मन के हर भार को
हल्का कर देती है
और विश्वास को दुगुना
.. कि जो भी होगा
वो अच्छा ही होगा !!
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© सीमा 'सदा'
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ख़्यालों के दरवाज़े पे
मैंने कभी कुंडी
नहीं चढ़ाई
तुमने भी कभी
भीतर आने से पहले
दस्तक़ नहीं दी !
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जिसको वक़्त मिलेगा
वो आना - जाना कर लेगा
यादों की बस्ती में
बड़ी जान-पहचान वाले
अपने रहा करते हैं 😊
© सीमा 'सदा'-
कुछ रिश्ते प्यार की भाषा
विश्वास की कीमत
और भावनाओं की बोली लगाकर
जिंदगी का सौदा कर डालते हैं !!
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© सीमा 'सदा'
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उम्र की गुल्लक को
खड़का के
आज फिर मैंने
ख्वाहिशों के सिक्के निकाले हैं
खरीदना है जिनसे मुझे
वही कागज में लिपटा
चटपटा चूरन
पारले की ऑरेंज टॉफी
जिनका स्वाद लिए
जिंदगी आज भी
बचपन के किस्से गुनगुनाती है !!!
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आप सभी को बाल दिवस की
खट्टी-मीठी शुभकामनाएं ....-
एक घूँट लिया था
तेरी यादों का
हिचकियाँ बड़ी देर तक
आती रहीं
उफ्फ़ ये तीख़ी यादें !
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© सीमा 'सदा'
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ज्ञान के अर्जन के लिए
पोथियों का पाठ नहीं बल्कि
ढाई अक्षर का जीवन दर्शन दिखलाना चाहती हूं
कहो अब
क्या तुम्हें मेरे साथ चलने में खुशी होगी
या दिशा बदलकर
तुम भी पूर्व पथ का अनुगमन करना चाहोगे
याद रखो परिवर्तन सृष्टि का नियम है
जो होकर रहेगा
मैने नहीं बोया तो कोई बात नहीं
एक न एक दिन वक्त ये बीज़ बोकर रहेगा!!
© सीमा 'सदा'
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उदासियों को कितने भी
ज़ेवर पहना दो हँसी के
उन्हें तो लिबास
ख़ामोशी का ही पसंद आता है !!
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© सीमा 'सदा'
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बेटी बाबुल के दिल का टुकड़ा भैया की मुस्कान होती है,
आँगन की चिड़िया माँ की परछाईं घर की शान होती है !
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खुशियों के पँख लगे होते हैं उसको घर के हर कोने में
रखती है अपनी निशानियां जो उसकी पहचान होती हैं !
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माँ की दुलारी पापा की लाडली भैया की नखरीली वो
रूठती झगड़ती इतराती हुई करुणा की खान होती है !
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भाई की राखी दूज का टीका मीलों दूर होकर भी जब
वो सजल नयनों से भेजकर हर्षाये तो सम्मान होती है !
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संध्या वंदन कर एक दिया आँगन की तुलसी पे रखती,
मानो ना मानो बेटी तो सदा दिल का अरमान होती है !
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फल्गु के तट पर
पिण्डदान के व़क्त पापा
बंद पलकों में आपके साथ
माँ का अक्स लिये
तर्पण की हथेलियों में
श्रद्धा के झिलमिलाते अश्कों के मध्य,
मन हर बार
जाने-अंजाने अपराधों की
क्षमायाचना के साथ
पितरों का तर्पण करते हुये
नतमस्तक रहा !
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रिश्तों की एक नदी
बहती है यहाँ अदृश्य होकर
जिसे अंजुरि में भरते ही
तृप्त हो जाते है
कुछ रिश्ते सदा-सदा के लिये !!!!-