Saurabh Mehta   (शब्द/अल्फ़ाज़)
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A word... that's worth a thousand pictures
Joined 19 September 2017


A word... that's worth a thousand pictures
Joined 19 September 2017
Saurabh Mehta YESTERDAY AT 20:21

शहर में तेरे गुज़ारा किस तरह हो
इश्क़ भी तुझसे दोबारा किस तरह हो

किसके चक्कर में पड़े हो यार तुम भी
जो न था मेरा तुम्हारा किस तरह हो

सोचता हूँ भूल जाना लाज़मी है
तेरी आदत से किनारा किस तरह हो

लौट कर आने की गुंजाइश कहाँ है
क्या पता तुमने पुकारा किस तरह हो

रात की अब तक चढ़ी है कैसे उतरे
तेरी आँखों का उतारा किस तरह हो

तैरना तिनके को ख़ुद आता नहीं है
डूबते का वो सहारा किस तरह हो

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Saurabh Mehta 10 NOV AT 18:00

पुरानी बात पर आख़िर , परेशाँ क्यूँ हुआ जाए
भरे ज़ख्मों को रह-रह कर भला क्यूँ कर छुआ जाए

मोहब्बत - आज़माई भी मोहब्बत में रिवायत है
मुहासिल है शिकस्त-ए-दिल, किसी जानिब जुआ जाए

इबादत जब कोई मुमकिन हो, इतना कमसकम कीजे
क़यामत तक के सजदे हों, फ़लक तक ये दुआ जाए

परेशाँ हूँ मैं दिल की साफ़गोई और सदाक़त से
ज़माना झूठ का, सम्त-ए-मुख़ालिफ़ ये मुआ जाए

भले लोगों की दुनिया में भला होना तो अच्छा है
मगर ये लाज़मी है के यहाँ बदतर हुआ जाए

कोई स्याही लिए एहसास सफ़हों पर गिराता है
और इक 'अल्फ़ाज़' है, जिसका लहू भी गेरुआ जाए

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Saurabh Mehta 5 NOV AT 6:49

उसे हँसाने के चक्कर में, ख़ुद को नई रुलाने का
रूठे को रूठा रहने दो, बिल्कुल नई मनाने का

इत्ती सी ख़्वाहिश थी अपनी, इत्ती तुमको बतलायी
इत्ता इत्ता करके सब कुछ, सबको नई बताने का

नहीं भरोसा दुनिया का, मैंने तो इतना जाना है
कोई कितना ही प्यासा हो, पानी नई पिलाने का

क़दम सम्हल के रखना अब से, छाछ फूँक कर के पीना
अगर कोई सर चढ़ कर बोले, सर पर नई बिठाने का

कुछ नइ होता बोल बोल के, जाता है जो, जाने दो
गला बैठ जाएगा भइया! इत्ता नइ चिल्लाने का

वो बोले कुछ और सुनाओ, ये क्या बकते हो 'अल्फ़ाज़'
सुनना हो तो यई सुनो, या कुछ बी नई सुनाने का

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Saurabh Mehta 22 OCT AT 18:15

पहचानी सी शक्ल मिली थी बेगाने अफ़सानों में
दिल उसको फिर ढूंढ रहा है अपनों में अनजानों में

कौन जलाता फिरता है यूँ अपने ही दीवानों को
ये कैसा है इश्क़ अजब इस शम्मा में, परवानों में

तुमने कैसे आज हमें देकर हिचकी का नज़राना
फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर नाम लिखा हैरानों में

तल्ख़ फब्तियाँ तीखी बातें उस पर तंज़ भरे अशआर
उनके लब हरकत में आए शहद घुल गया कानों में

हर लम्हा हसरत रखता था और ज़रा सा जीने की
हम ने दफ़्न किया सबको यादों के कब्रिस्तानों में

अपना ख़ंजर, सारे मंज़र आया था वो लेकर संग
हुआ इज़ाफा कल फिर मुझ पर क़ातिल के एहसानों में

अच्छा था जो छोड़ गए कूचा-ए-दिल दीवाने का
कौन भला यूँ घर लेता है बीहड़ में, वीरानों में

तुमसे ही रंगत पाते हैं अब मेरे सारे 'अल्फ़ाज़'
जिनसे रंग भरा मैंने इन गज़लों, नज़्मों, गानों में

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Saurabh Mehta 17 OCT AT 6:37

रात... बड़ी ख़राब है..
हर रात ख़राब कर देती है..

रात भर जाग कर
हर सुबह, सुबह को दे देती है
कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब
कुछ गुज़री रातों के किस्से
कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक
और सिरहाने पर
माज़ी के खारे धब्बे

रात बड़ी ख़राब है
दिन भर के मुरझाए ज़ख्मों को
फिर हरा कर देती है और
महकने देती है रात भर
किसी रात रानी की तरह

मौका देती है कि सम्हल जाऊँ मैं
और फिर ले जाती है अपने साथ
पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर

रात.. बड़ी ख़राब है
पर, एक रात ही तो है
जो साथ होती है रात भर
और ख़ामोशी से सुनती है
मेरी हर ख़ामोशी को
समझती है..
मेरी हर बात को...
मेरी हर रात को
रात....

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Saurabh Mehta 8 OCT AT 22:09

कितने चेहरे हैं मेरे, और कितने ही गिन पाओगे तुम?
हर चेहरा है यक्ष प्रश्न, कितने उत्तर दे पाओगे तुम?

क्या अपने जीवन ब में तुमने द्वंद्व कोई देखा होगा!
कैसे मेरे मन की पीड़ा का अनुभव तुमको होगा।

क्या मुझको यूँ राख बनाकर आग तुम्हारी बुझ पाएगी?
मुझे जलाकर और तुम्हारे मन को ठंडक पड़ जाएगी?

क्या तुमने भी अपना जीवन स्वाभिमान के साथ जिया है?
और उसे इस जग ने केवल अहंकार का नाम दिया है?

क्या अपने प्रियजन हेतु सर्वस्व दाव पर लगा सकोगे?
निश्चित जानो जब विनाश, क्या तब भी रण में अडिग रहोगे?

मेरे अवगुण लेकर कब तक अपनी ढाल बनाओगे तुम?
होना राम चलो दुष्कर है, क्या रावण बन पाओगे तुम?

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कितने ही चेहरे हैं मेरे..

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Saurabh Mehta 4 OCT AT 9:47

वो ले आए आतिश, के चराग जलाएंगे
और क्या लाते, इक जलते हुए घर से

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Saurabh Mehta 25 SEP AT 11:23

रूठने वाले को इक हद तक मनाना चाहिए
ज़िन्दगी जब कुछ सिखाए सीख जाना चाहिए

रोज़ खोने का है डर, तो डर ख़तम हो जाएगा
एक ही बारी में खोकर भूल जाना चाहिए

एक अर्से से नहीं सोये थे उनकी याद में
कमबख़त इस ख़्वाब को भी नींद आना चाहिए

ग़ौर से देखो कि ये दुनिया बड़ी दिलचस्प है
हर तमाशाबीन को कोई ठिकाना चाहिए

आज दिल मायूस है ना जाने अब किस बात पे
हर दफ़ा इसको नया कोई बहाना चाहिए

उफ़, मिरी ये शक्ल पहचानी सी दिखती है मुझे
याद आया, मुझको अक्सर मुस्कुराना चाहिए

कैफ़ियत दिल की बयाँ 'अल्फाज़' कैसे हम करें
दो घड़ी की उम्र है और इक ज़माना चाहिए

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रूठने वाले को...

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Saurabh Mehta 5 SEP AT 2:06

Me: aah! Espresso shot is like a sip of life..
Also me: naah... it's not that bitter...
I mean the shot..

*sigh*

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Sip of life

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Saurabh Mehta 29 JUN AT 10:00

What if I play 'you'
With you.

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