Saurabh Mehta   (शब्द/अल्फ़ाज़)
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A word... that's worth a thousand pictures
Joined 19 September 2017


A word... that's worth a thousand pictures
Joined 19 September 2017
Saurabh Mehta 31 MAY AT 7:12

ताज़ा ताज़ा दानाई है और पुराना पागलपन है
हाँ उल्फ़त का क़तरा-क़तरा दाना-दाना पागलपन है

मेरी नज़रों से देखो तो सारी दुनिया दीवानी है
तेरी आँखों में भी कैसा यार सुहाना पागलपन है

दोज़ख़ या जन्नत में रक्खे ये उसकी अपनी मर्ज़ी है
पर इंसानी दुनिया में तो आना जाना पागलपन है

अब तक चलना इक दूजे संग शायद अपना पागलपन था
जैसे राहों का मंज़िल तक साथ निभाना पागलपन है

ये अश्कों की जुरअत है जो तुमसे शिकवे कर बैठे हैं
वर्ना सहरा को दरिया के ख़्वाब दिखाना पागलपन है

दुश्वारी है बे-ताबी है बे-तरतीबी बे-ज़ारी है
ग़ौर से देखो सब है इसमें एक ख़ज़ाना पागलपन है

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Saurabh Mehta 9 MAY AT 16:29

नए मौसम में फिर हम तुम मिलेंगे देखना
तुम्हारे ग़म से अपने ग़म मिलेंगे देखना

किसी ने कह दिया कमतर अरे छोड़ो मियाँ
जहाँ ढूंढोगे ख़ुद से कम मिलेंगे देखना

कभी गर एक जुगनू ने दिखाया हौसला
कई महताब फिर मद्धम मिलेंगे देखना

इधर शिकवे रखे हैं और उधर रुस्वाइयाँ
जिधर देखो यही आलम मिलेंगे देखना

ख़ुदाया है कहाँ तू इस तरफ़ भी देख ले
वगरना हर तरफ़ मातम मिलेंगे देखना

वो जिसकी पीठ पर खंजर के ज़्यादा घाव हैं
उसी के पास हाँ मरहम मिलेंगे देखना

संभलना के लबों को छू न पाएँ उँगलियाँ
दहकती आग से रेशम मिलेंगे देखना

बयाँ 'अल्फ़ाज़' अपनी तिश्नगी जो कर गए
तिरे रुख़सार पे शबनम मिलेंगे देखना

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Saurabh Mehta 7 MAY AT 16:43

पुराने ग़म भुलाने में ज़ियादा कुछ नहीं लगता
कोई पूछे तो कहना वो हमारा कुछ नहीं लगता

नयी रुस्वाइयाँ हर बार मुझसे मिलने आती हैं
मुझे उसकी मुहब्बत में पुराना कुछ नहीं लगता

नज़रअंदाज़ कर-कर के तुम अपना क़द बढ़ाते हो
हमारी जान जाती है तुम्हारा कुछ नहीं लगता

ज़रा इक हाथ बढ़ जाए तो शायद थाम भी लें हम
हमारा ख़ुद से होकर तो इरादा कुछ नहीं लगता

ये कैसा नूर है उनमें के बस देखे ही जाते हैं
अब इन आँखों को ये शोला शरारा कुछ नहीं लगता

तुम्हें समझा रहा हूँ फिर के सौदा फ़ायदे का है
किसी के दिल में घर करके किराया कुछ नहीं लगता

कभी 'अल्फ़ाज़' टूटें तो बिखर जाते हैं मिसरों पर
ग़ज़लगोई में वैसे तो हमारा कुछ नहीं लगता

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Saurabh Mehta 9 MAR AT 2:04

क्यूँ ना ख़ुद को समझा लें
कुछ ख़्वाब अधूरे ही अच्छे।
क्या हो वर्ना,
कि मुकम्मल हो ख़्वाब कोई
और नींद खुल जाये!

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Saurabh Mehta 22 JAN AT 8:06

तुम जैसे तुम एक ही हो ना, तुम जैसों की बस्ती है क्या
सोहबत में झूठों की हो तुम, बात तुम्हारी सच्ची है क्या

ऊपर से क्या दिखता होगा, जीना भी कितना मुश्किल है
मुझसे पूछो दुनिया क्या है , यहाँ ख़ुदा की हस्ती है क्या

मैंने अपने हाथों से , हर एक लकीर मिटा डाली है
बिकने को तय्यार खड़ा हूँ क़िस्मत इतनी सस्ती है क्या

आग का दरिया तय करना है, डूब गए तो क्या हासिल है
इश्क़ का रस्ता आसाँ कर दे, ऐसी कोई कश्ती है क्या

आज सुबह से ख़बरों में है कल ज़्यादा ही ख़ुश दिखता था
कल ही तो उसने पूछा था, पास तुम्हारे रस्सी है क्या

तुम भी इतनी नासाज़ी से मुझसे जिरहें क्यूँ करते हो
एक दफ़ा मुझको तो देखो, मेरी हालत अच्छी है क्या

अब भी वैसे का वैसा हूँ , माज़ी में जाकर तो देखो
उन सारे वादों के जैसे , याददाश्त भी कच्ची है क्या

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Saurabh Mehta 23 DEC 2019 AT 5:51

उनको शिकवा है, मैं सादा लिखता हूँ
जितना हूँ, उससे भी ज़्यादा लिखता हूँ

तुमने शाहों में देखा होगा मुझको
खेल में अपने, उनको प्यादा लिखता हूँ

होगी समझ सुख़न की तुमको, लगता है
कहता हूँ मैं शे'र , इरादा लिखता हूँ

कोई मौज दिलाए अबके मुझको याद
रेत पे उँगली से हर वादा लिखता हूँ

सागर भर साग़र ख़ाली कर देता हूँ
अब तो सफ़हों पर भी बादा लिखता हूँ

बातों में मेरी अब लज़्ज़त कैसे हो
ज़िक्र नहीं उसका , बेस्वादा लिखता हूँ

कोई तो आकर मुझको रोके 'अल्फ़ाज़'
मैं अब उसको और ज़ियादा लिखता हूँ

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Saurabh Mehta 26 NOV 2019 AT 8:08

बातें ख़ुद से ही बुन लेना
मौन रहूँ मैं, तुम सुन लेना

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Saurabh Mehta 25 NOV 2019 AT 10:55

कब ये गणित लगाया मैंने
क्या खोया क्या पाया मैंने

उसे मुकम्मल करते करते
ख़ुद को बहुत लुटाया मैंने

दिल तो बच्चा ही था आख़िर
बातों से फुसलाया मैंने

जहाँ जहाँ उसको पाया था
ख़ुद को वहीं गँवाया मैंने

ख़ुद से ख़ुद ही बातें करके
उसको बहुत सुनाया मैंने

जान बूझ के इश्क़ कर लिया
ये क्या किया ख़ुदाया मैंने

सही वक़्त के इंतज़ार में
वक़्त कर दिया ज़ाया मैंने

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Saurabh Mehta 18 NOV 2019 AT 1:21

ज़माने भर का नार-ओ-नूर सब वो ख़रीद रखता है
मुझे शक है वो अपनी जेब में ख़ुर्शीद रखता है

दिसंबर माह में मोज़ा कोई खिड़की पे लटका के
वो पागल साल भर तौफ़ीक़ की उम्मीद रखता है

सवेरे से नज़र आया नहीं तो रख लिया रोज़ा
उसी को देख कर कम्बख़्त दिल ये ईद रखता है

यक़ीनन है बड़ा शातिर खिलाड़ी दहर-दारी का
वो दुश्मन भी चुनिन्दा और यार मुफ़ीद रखता है

सम्हल कर राब्ते रखना तुम उससे इश्क़-ओ-उल्फ़त के
हर इक लम्हे के सौदे का हिसाब-ओ-रसीद रखता है

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Saurabh Mehta 12 NOV 2019 AT 20:21

हिज्र में तेरे गुज़ारा किस तरह हो
इश्क़ भी तुझसे दोबारा किस तरह हो

किसके चक्कर में पड़े हो यार तुम भी
जो न था मेरा तुम्हारा किस तरह हो

सोचता हूँ भूल जाना लाज़मी है
तेरी आदत से किनारा किस तरह हो

लौट कर आने की गुंजाइश कहाँ है
क्या पता तुमने पुकारा किस तरह हो

तेरी आँखों की ख़ुमारी यूँ चढ़ी है
सोचता हूँ अब उतारा किस तरह हो

तैरना तिनके को ख़ुद आता नहीं है
डूबते का वो सहारा किस तरह हो

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