Sandhya  
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Joined 17 November 2018


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Joined 17 November 2018
Sandhya 19 MAY AT 21:51

सीने में दबी बात न ही जुबां पर लाता हूँ,
ज़माना कहता है,
मैं हर घड़ी गुनगुनाता हूँ।।

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Sandhya 11 MAY AT 18:46

किस बात की ख़ुशी हो ,
किस बात का हो हमें गम,
न ही नाराज़गी है कहीं,
फिर भी बेचैनी न हो कम,
डूबता इक अँधेरा वही,
खिलता नया सवेरा हो,
खो गया शायद
किसी मासूम जान का,
जैसे बचपन अधूरा हो,
कहावते सुनते हैं
हम इक नए समां
के आने की,

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Sandhya 3 APR AT 14:34

इक अजीब सी दुविधा ,
इक अजीब सी सुबह,
इक वही पुरानी कहानी,
जिसका था सबको पता,
वो दौर कुछ वर्षों का ,
वो दौर बचपने संजोये था,
बस हुआ कुछ नही,
दूरियां बढ़ गयीं
दूरियां बढ़ गयीं।।

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Sandhya 19 MAR AT 23:05

कौन हूँ मै,
क्या पता,
क्या ख़बर ,
निकली हूँ किस रास्ता,
न ही किसी से बैर है,
न ही किसी से वास्ता,
जान भी लिया सभी को ,
अपनापन भी झूठ है,
घड़ी - घडी बदलता जाने ये कैसा रूप है,
न टूट तू बिखर नहीं,
किसी की परवाह मत कर युँही,
चल वहीं जहाँ तेरी चाहत थी रही,
कदम बढ़ा ,
बढ़ा तू फूँक -फूँक के,
कर थोड़ा सब्र ज़रा,
न जिंदगी से रूठते,
न जिंदगी से रूठते।।



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Sandhya 15 FEB AT 23:23

वो स्कूल के दिन---- आगे पूरा पढ़ें।👇

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Sandhya 13 FEB AT 20:11

क्यों लिख रहा हूँ मैं ,
न कोई इंतेजार है ,
न कोई बीता खुमार है,
न कोई दीदार है,
न किसी बोझ में
जिंदगी दुश्वार है,
जाने क्यों लिख रहा हूँ मैं.......

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Sandhya 13 FEB AT 19:39

किस राह का पथिक हूँ
मैं क्या जानूँ,
किस राह में भटकूँ
न मैं जानू ,
किस -किस से पूंछूं
किस की मैं सच मानूँ,
कैसे इस दिल में रखलूँ,
कैसे मन को मैं समझालूं,
किस राह का पथिक हूँ
मैं क्या जानू।।
--संध्या

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Sandhya 9 FEB AT 12:15

एक मुझे भी चाहिए !
एक मुझे भी दिलाइए!
बच्चों में बस यही शोर हो!

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Sandhya 9 FEB AT 11:53

एक स्वप्न👇

(कविता)

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Sandhya 8 FEB AT 8:39

मोहब्बत की बस यही इन्तेहाँ हैं,
दूर होकर भी सबकुछ बयां हैं,
आखिर ये कैसी सज़ा है,
असल में इसी में तो असली मज़ा हैं,
मोहब्बत की बस यही इन्तहा है।

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