Sandeep Vyas   ('व्यास' संदीप)
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Joined 30 December 2016


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Sandeep Vyas 14 JUN AT 13:32

'निर्माण-सैनिक'

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Sandeep Vyas 10 JUN AT 9:09

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Sandeep Vyas 8 JUN AT 23:12

जुल्म जो इस दुनियाँ में इस कदर बढ़ गया है
लगता है ईश्वर के चश्मे का नम्बर चढ़ गया है!

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Sandeep Vyas 8 JUN AT 21:51

उद्गार इस दिल के
जब काफ़िया मिला लेते हैं
ये लोग नाहक़ ही
उसे शायरी समझ लेते हैं...!

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Sandeep Vyas 31 MAY AT 15:58

जहाँ
पुरूष को अपने
सम्पूर्ण तपो बल, साधना,
शक्ति, भक्ति, आध्यात्म, त्याग
आदि के प्रयोग उपरांत भी,
मोक्ष प्राप्ति दुर्लभ है...
वहीं
एक स्त्री,
मात्रित्व की अनुभूति मात्र से,
सहज ही ईश्वरत्व प्राप्त कर लेती है।
हे माँ, तू वन्दनीय है,
सच है, धरती पर तू ही ईश्वर है।

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Sandeep Vyas 29 MAY AT 9:35

राजनीति में आज कल, नही मान सम्मान
मूरख सब नेता भये, भक्त भये विद्वान

भक्तों से चमचे लड़ें, चलें शब्दों के बान
नेता सब घी पी रहे, जनता में घमासान

ऐसी बस को भेजिए, कहीं पहुँच न पाए
जनता भी पैदल चले, फोटो भी खींच जाए

रस्ते पर जनता पड़ी, त्राहि त्राहि करी जाय,
गुनीजन आपस में लड़ें, कौन उन्हें समझाए

सत्ता का चश्मा पहन, नेता जी इतराए
गूंगा भाषण दे रहा, अंधा आँख दिखाए

लॉकडाउन लंबा भया, जले दीप, बजे थाल
सत्तर दिन के बाद भी, जस का तस है हाल

काल कोरोना का विकट, राजनीति तजो तात
दुखियारी प्रजा देख रही, मारेगी कल लात

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Sandeep Vyas 28 MAY AT 22:03

बना कर इश्क, मौला भी ये बोला होगा,
कसम इंसान की, गलती बड़ी हो गयी

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Sandeep Vyas 27 MAY AT 13:39

फ़ासले दूरियों से नहीं हुआ करते
नज़दीकियाँ पैदा करती हैं फ़ासले
हुईं जब बेतकल्लुफ़ नज़दीकियाँ
खुद ब खुद बन गयीं वो फ़ासले

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Sandeep Vyas 27 MAY AT 7:45

लाख सुना हो तू ने की हम पत्थर दिल हैं सनम
घड़ी भर को आगोश में आने दे, पिघल जाएंगे

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Sandeep Vyas 26 MAY AT 19:33

ये दरो-दीवार, घर-ओ-बाज़ार सब अपना है मगर
बस अब तू मेरी बाहों में आजाये तो कुछ बात बने

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