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Sandeep Vyas

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Sandeep Vyas 16 JAN AT 14:13

कब नज़रें झुकानी है, कब लब खोलना है
ये उम्र सिखा देती है कहाँ क्या बोलना है

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Sandeep Vyas 15 JAN AT 21:44

रहबरों की भीड़ में अब दिलबर तलाश कर
बंगला तो बन गया है, तू घर तलाश कर

अपने ही आईने में हो, गैरों का अक्स तो
गैरों के आईने में तू खुद को तलाश कर

कब तक रहेगा तू यूँ पतंगों को ताकता
खुदके लिए फ़लक का टुकड़ा तलाश कर

दरिया के मुहाने पे जो, रह कर तू है प्यासा
घर लौट जा मिट्टी का तू मटका तलाश कर

क्यूँ आँसू बहा रहा है यूँ दौलत के ढेर पर
तू मुफलिसी का फिर वही सुकूँ तलाश कर

अपनों की साज़िशों से कब तक लड़ेगा तू
छोड़ उनके गिरेबाँ, निगहबान तलाश कर

दुनियाँ की भीड़ में तन्हा है 'खुर्द' क्यूँ
तन्हाइयों में चल नई दुनियाँ तलाश कर

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Sandeep Vyas 7 JAN AT 13:32

मोहब्बत थी या के शग़ल था, कैसे कह दूँ
वो दिल से खेला बहुत, मगर खेला दिल से

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Sandeep Vyas 4 JAN AT 20:30


Gulabi aankhen....(whistling)

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Sandeep Vyas 1 JAN AT 17:16

किस कदर अब दर्द से दिल आशना हुआ
लहू न महके साँसों में तो आता नहीं सुकूँ

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Sandeep Vyas 31 DEC 2018 AT 12:36

उठाओ मुट्ठी भर ख़ाक, डाल दो मेरी यादों पर, कर दो रुख़सत
मोहब्बत दफ़न करना तो नाज़नीनों की पुरानी आदत है फ़क़त

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दफ़न कर दो..

#dafan #mohabbat #nazneen #khak #yqquotes #sanrachna

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Sandeep Vyas 31 DEC 2018 AT 6:13

मेरे बाग का वो परिंदा, कुछ अनमना सा बैठा है
किसी और शजर पर जाने आशियाँ बना बैठा है

अब न वो रंगत है न वो बेबाक है पहले की तरह
जाने क्या बात है जिसे वो दिल से लगा बैठा है

हमने चाहा की पूछ लें आखिर के माजरा है क्या
फेर कर नज़रें अपनी, वो चुप सी लगा बैठा है

जब से रूठा है, सारा आलम खफा खफा सा है
जाड़े की नर्म धूप को, वो आसाढ़ बना बैठा है

हम हैं मजबूर के क़ैद कर सकते नहीं हैं उसको
वो भी तो नादाँ है जो अपना दिल गवाँ बैठा है

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Sandeep Vyas 29 DEC 2018 AT 19:41

बाद मरने के भी जो जन्नत में सुकूँ न मिला,
लौट कर आएँगे हम एक दिन तेरे दीदार को...

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Sandeep Vyas 29 DEC 2018 AT 18:50

कुछ तो है जो आज भी दस्तक देता है सीने में
दिल तो हो नहीं सकता, फिर शायद तुम ही हो

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Sandeep Vyas 28 DEC 2018 AT 13:54

वाक़िफ है सारी दुनियाँ मेरे मिज़ाज से,
हवाएँ भी खौफ खाती हैं मेरे चिराग़ से

तिश्नगी का मेरी, अब न तू हिसाब कर
पाला नही पड़ा तेरा जंगल की आग से

जलवों से है हमारे, इस दुनिया में रौशनी
दौरे ख़िजां मिटा दें, हम गुज़रें जो बाग से

कहते हैं लोग शायर, आशुफ्ता-सर हैं हम
खुदको सजाए फिरते हैं दामन के दाग से

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