Sandeep Vyas  
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Joined 30 December 2016


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Joined 30 December 2016
Sandeep Vyas YESTERDAY AT 10:20

मैं जुगों जुगों का प्यासा हूँ, तुम फागुन बन कर आ जाओ,
हर रंग ज़माने का झूठा, अधरों से रंग लगा जाओ...

रोम रोम पुलकित कर दो, हर अंग से अंग लगा जाओ,
तुम ओढ़ चुनर धानी रंग की, इस मरु जीवन पर छा जाओ,

साँसों का रंग चढ़ा दो तुम, मेरी अलसाई साँसों पर,
मेरे सीने की धड़कन को, तुम अतरंगी सा कर जाओ,

मैं मंत्रमुग्ध सा हो जाऊँ, तुम आँखियों से मनुहार करो,
किंशुक फूलों सा केसरिया, तुम यौवन का श्रृंगार करो,

मैं प्रेम अगन में झुलस रहा, महुआ की बनी शराब हो तुम,
मैं कुँज भ्रमर सा मतवाला, निशगंधा मधु पराग हो तुम,

हैं पवन के झोंकें झूम रहे, टेसू ने रंग बिखेरे हैं,
तुम बन कर केसर की डाली, अंतर्मन महका जाओ,

ओ मृगनयनी, अलबेली नार, पायल झँनकाती आ जाओ,
कुछ नयन मटक्का कर लें हम, सुंदर मुखड़ा दिखला जाओ,

हृदय वीणा की प्रेम तान पर, मधुर गीत कोई गा जाओ,
हम थाल सजाएँ रंगों का, तुम प्रीत के रंग लगा जाओ..

मैं जुगों जुगों से प्यासा हूँ, तुम फागुन बन कर आ जाओ...

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Sandeep Vyas 18 MAR AT 19:02

तोहमतें मजज़ूब-ए-ख़राबाती की ताउम्र मिलीं
हम मजबूर थे, हमें शरीफों की महफ़िल न मिलीं

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Sandeep Vyas 17 MAR AT 23:23

दुश्वारियों के ज़िन्दगी से सिलसिले न गए
गुनाह हुआ के हमसे ये लब सिले न गए

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Sandeep Vyas 17 MAR AT 10:06

सुबह की मॉर्निंग वॉक पर
एक सूखा पत्ता पैरों में आया
और शायद दर्द से चरमराया..

यूँ तो आदत है मेरे कानों को
दिन भर किसी न किसी की
चरमराहट सुनते रहने की..

रोज़ मर्रा की वॉक में
हर एक आमादा है चढ़ जाने को
किसी न किसी के ऊपर पैर रख कर..

और कुचले हुए लोग बस
चरमरा कर रह जाते हैं
इस पत्ते की तरह
शायद कहीं से टूट भी जाते हैं
हर गुज़रते हुए कदमों के
अनायास ही चढ़ जाने पर
और चढ़ने वाला है कि बेफिक्र
इस चरमराहट से अनिभिज्ञ,
अपनी धुन में बढ़ता जाता है
फिर किसी और पर से गुज़र जाने को..

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क्या आप ने भी कभी किसी की चरमराहट सुनी है...?

#चरमराहट #yqquotes #sanrachna

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Sandeep Vyas 13 MAR AT 23:01

राजनीति में रीत ये, हर दिन बढ़ती जाए
अपने हित का न मिले, जूता देय टिकाए

दौर चुनावी चल रहा, कहीं चूक न जाए
ढीला जूता राखिये, तुरत काम दे जाय

चमड़े का जूता भया, राजनीति का अस्त्र
पलक झपकते मारिये, ज्यों हो जाएं त्रस्त

ऐसा जूता मारिये के भीड़ जमा हो जाय
मार मार जूता फटे, सो नेता कहलाए

कुट कुट के भए अधमरे,जरा सरम न आये
कुर्सी के रहे लालची, सौ सौ जूते खाए

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Sandeep Vyas 15 FEB AT 14:48

शरीर के चीथड़े,
बारूद की गँध,
चैनलों का चीखना,
अनर्गल बयानबाज़ी,
बैठकों के दौर,
कड़ी निंदा,
मुआवजे का ऐलान,
मोमबत्तियाँ,
शोक सभाएँ,
और मुँह तोड़ जवाब के भरोसे के बीच,
फिर एक बार,
एक अबोध अनाथ बच्चा हैरान है,
की पापा कहाँ गए...

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हैरान..

#yqquotes #sanrachna

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Sandeep Vyas 14 FEB AT 23:12

ये जो गर्म लहू बहा है ज़मी पर, इसे सूखने में ज़माने लगेंगे
मगर देश के कुछ गद्दार मिलकर फिर आतंकियों को बचाने लगेंगे..

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Sandeep Vyas 13 FEB AT 12:25

तुम्हें क़सम है मेरी,मेरा हाल-ए-दिल न पूछना
मुझे क़सम तुम्हारी, मैं हर दर्द छिपाऊँगा

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Sandeep Vyas 4 FEB AT 15:50

यूँ लगता है कि जैसे एक परिंदा हूँ मैं,
और इस ज़िन्दगी की चौं चौं हो तुम

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Sandeep Vyas 1 FEB AT 9:07

मैं उलझनें ज़िन्दगी की सुलझा तो लूँ
पर सोचता हूँ खाली बैठ करूँगा क्या

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