Sandeep Vyas  
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Joined 30 December 2016


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Joined 30 December 2016
Sandeep Vyas 20 MAY AT 19:46

सबब मालूम क्या उसको, मेरे जीने का मरने का
ज़माने को है बस हासिल हुनर बदनाम करने का

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Sandeep Vyas 10 MAY AT 9:49

बहुत गिर लिए, अब ज़मीर जगाएँ
खत्म हुए चुनाव, चलो रोटी कमाएँ

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Sandeep Vyas 7 MAY AT 22:11

चुनाव की तीव्र आँधी चल रही है
आरोपों की धूल उड़ रही है
नफरतों का कचरा फैल रहा है
विश्वास के खंबे लुड़क रहे हैं
संबंधों के तार झूल रहे हैं
सभ्यता की दीवारें ढुलक रही हैं
भाईचारे की छतें दरक रही हैं
अमन के कबेलू चटक रहे हैं
सौहाद्र के दरख़्त उखड़ रहे हैं
अपनेपन की टहनियाँ टूट रही हैं
हर आँख में घृणा की किरकिरी है
और बेचारा अतुल्य भारत..
घबराया, सहमा सा
एक हाथ से धोती
तो दूसरे हाथ से पगड़ी संभाले
इस तूफान के गुज़र जाने की
प्रतीक्षा में है...
है ना 'फनी'...?

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Sandeep Vyas 14 APR AT 11:54

हो फ़ितूर कोई या के हो नशा कोई
ज़िंदा रहना हो तो ज़रूरी है वजह कोई

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Sandeep Vyas 12 APR AT 20:17

तमन्नाओं को आओ, ऐसे बाँध कर रख दें
के जैसे इस ज़मी को आसमाँ पर टाँग कर रख दें

सितारे हैं तो चमकेंगे, चमकता चाँद भी तो है
उठेंगे जो मचल के हम, रवि को फाँद कर रख दें

हवाओं का जिगर क्या,जो अपने बाल बिखराए
जो हम जिद पे आएँ, भँवर को थाम कर रख दें

संभलना ऐ जहाँ वालों, के हम आगाज़ करते हैं
जरा सा जोश में आयें ज़मीं को साँध कर रख दें

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Sandeep Vyas 8 APR AT 10:08

हसरतों के सिक्के लिए, उजाले खरीदने निकले थे हम
उम्र की पहली गली में ही, जिम्मेदारियों ने लूट लिया..

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Sandeep Vyas 27 MAR AT 8:41

ऐ मध्यमवर्गी
तू रगड़, घिसट, तड़प,
छिल, कट, निपट
पर कमा...

खून रिसे,
तो देशभक्ति का
मरहम लगा
बाकि काम
हम पर छोड़ दे..

हम लुटाएँगे, बहाएँगे,
ठिकाने लगाएँगे
भुनाएँगे वोटों से
और बदले में तुझे देंगे
विकास..

घबरा मत पगले
आज नहीं तो कल दे देंगे..
तू भी यहीँ, हम भी यहीँ...

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Sandeep Vyas 26 MAR AT 9:26

वह
गंगा किनारे
कपड़े धो रही है..

मन ही मन
सफ़ेदपोशों कि
काली करतूतों पर
रो रही है...

वस्त्रों पर साबुन लगाती
पत्थर पर पछीटती
कभी हाथों से मसलती
कभी इकठ्ठा कर घूँसे बरसाती
तो कभी पानी में खंगालती...

नहीं निकाल पा रही है
कपड़ों की धवलता में
छुपी मलिनता को..

सफ़ेदपोशी
भीतर तक काली है..

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Sandeep Vyas 24 MAR AT 13:28

वक्त क्या है
महज़ फ़ासला है
दो लम्हों के बीच..

एक मुअम्मा है
ज़िन्दगी का
समझ से परे..

लम्हे ख़ुशगवार हों
तो पंख बन ऊगता है
बदन पर..

लम्हे बोझिल हों
तो बन जाता है
मकड़ जाल...

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Sandeep Vyas 21 MAR AT 10:20

मैं जुगों जुगों का प्यासा हूँ, तुम फागुन बन कर आ जाओ,
हर रंग ज़माने का झूठा, अधरों से रंग लगा जाओ...

रोम रोम पुलकित कर दो, हर अंग से अंग लगा जाओ,
तुम ओढ़ चुनर धानी रंग की, इस मरु जीवन पर छा जाओ,

साँसों का रंग चढ़ा दो तुम, मेरी अलसाई साँसों पर,
मेरे सीने की धड़कन को, तुम अतरंगी सा कर जाओ,

मैं मंत्रमुग्ध सा हो जाऊँ, तुम आँखियों से मनुहार करो,
किंशुक फूलों सा केसरिया, तुम यौवन का श्रृंगार करो,

मैं प्रेम अगन में झुलस रहा, महुआ की बनी शराब हो तुम,
मैं कुँज भ्रमर सा मतवाला, निशगंधा मधु पराग हो तुम,

हैं पवन के झोंकें झूम रहे, टेसू ने रंग बिखेरे हैं,
तुम बन कर केसर की डाली, अंतर्मन महका जाओ,

ओ मृगनयनी, अलबेली नार, पायल झँनकाती आ जाओ,
कुछ नयन मटक्का कर लें हम, सुंदर मुखड़ा दिखला जाओ,

हृदय वीणा की प्रेम तान पर, मधुर गीत कोई गा जाओ,
हम थाल सजाएँ रंगों का, तुम प्रीत के रंग लगा जाओ..

मैं जुगों जुगों से प्यासा हूँ, तुम फागुन बन कर आ जाओ...

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