Sandeep Vyas  
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Joined 30 December 2016


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Joined 30 December 2016
Sandeep Vyas 26 JUL AT 17:38

ये जो काम करते हैं
तुम्हारे लिए,
इंसान हैं ये..

नौकर, ड्राइवर
माली, हाली
सब इंसान हैं ये
बस पैसा थोड़ा कम है
इनके पास
और मुसीबतें
कुछ ज्यादा...

अरमान,
उम्मीदें और सपने
अपने दिल में दबाए
एक ज़िंदा लाश,
इन्हें है तलाश तो बस
इंसानियत की..

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Sandeep Vyas 26 JUL AT 0:32

अब तो वो हमें छोड़ के जाने पर आमादा है
हम तो भूल गए थे कि वो सिर्फ़ एक मादा है

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Sandeep Vyas 24 JUL AT 8:07

दोस्तों का ज़ायका तो बदल लिया करो
कभी कभार हमसे भी मिल लिया करो

आएँगे लौट के न कभी अब के जो गए
लुत्फे-मुलाक़ात तो कामिल लिया करो

उधड़ती ही जा रही है, सिलाई वक्त की
टाँका दो टाँका इसे भी सिल लिया करो

उकता गए हो तुम जो समुंदर से जूझते
पलभर तो आसरा ए साहिल लिया करो

दौर ए बहार में भी यूँ बेज़ार से हो क्यों
बदले में मियाँ दिल के, दिल लिया करो

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Sandeep Vyas 23 JUL AT 10:10

दोस्त
जब ज्यादा करीब आते हैं,
आईने बन जाते हैं..

चमकदार
अक्स में ढकी
किरदार की बारीकियाँ
दिखाते हैं

ठेस
लगने न देना इन्हें,
ये जो चिटके तो
दिल में गहरे गड़ जाते हैं

दोस्त
जब ज्यादा करीब आते हैं,
आईने बन जाते हैं..

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Sandeep Vyas 11 JUL AT 1:34

बहुत भोला है सनम
कुछ न समझेगा

इस दुनिया के ये सितम
कुछ न समझेगा

दिल में छुपे लाख हैं ग़म
कुछ न समझेगा

रौनक ए रुखसार के ख़म
कुछ न समझेगा

बार-ए-ग़म, दीदा-ए-पुरनम
कुछ न समझेगा

क्यूँ परेशां हैं अब हम
कुछ न समझेगा

बहुत भोला है सनम...

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Sandeep Vyas 9 JUL AT 17:56

ज़िन्दगी में हासिल कोई मुकाम होना चाहिए
हो भले बदनाम, मगर नाम होना चाहिए

कर दो ये ऐलान तुम अहल ए चमन में अब
हो शज़र कोई मगर फल 'आम' होना चाहिए

खुद भले हम करते रहें दुनिया भर में लोफ़री
सामने वाला जो मिले वो 'राम' होना चाहिए

रहना हो जो मुल्क में तो गाँठ मन मे बाँध लो
वतनपरस्तों का यहाँ एहतराम होना चाहिए

हो कोई मज़हब, कोई ईमान हो परवाह नहीं
शर्त बस इतनी, दिल में हिंदुस्तान होना चाहिए

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Sandeep Vyas 7 JUL AT 9:54

मेरे दरवाज़े की नक्काशी पर यूँ उंगली उठाने वाले
हो सके तो अपनी उखड़ी चौखट की कील ठोंक ले

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Sandeep Vyas 5 JUL AT 17:21

बुधिया खामोश है
कच्चे खपरों की
उबड़-खाबड़ छत में से
फिसल कर,
नीचे मुँह बाए पड़े
पतीले, कटोरे और भगौने में
कूदती हर एक बूंद
आज जाने क्यूँ
जलतरंग सी उसके कानों में
पहन कर गूंज रही है,
पथराई आंखों में आज
अजीब सा सुकून पसरा है
जब से खबर लगी है
के छत चाहे गरीब सी हो
या फिर तीन हज़ार करोड़ की
टपकती ज़रूर है,
आज पहली दफ़ा
उसने बारिश का गीत सुना है..

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Sandeep Vyas 3 JUL AT 18:26

उम्र भर का इल्म भी हमको सिफर लगता है
बाखुदा अबतो इस मोहब्बत से डर लगता है

इतना नाज़ुक है वो के पैकर ए गुल लगता है
क्या करूँ पर मुझे अब खार से डर लगता है

हद्दे-बीनाई तक रौशन हैं बस उसके जलवे
जल न जाऊँ कहीँ इस बात से डर लगता है

सोचता हूँ के माँग लूँ मैं अब खुदा से उसको
पर बे-वज़ू मस्ज़िद में जाने से डर लगता है

मायूसी-ए-मलाले-मोहब्बत अब क्या कहिए
हमको तो मौसमे-बारिश से डर लगता है

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Sandeep Vyas 25 JUN AT 20:08

मुकद्दर समझूँ या फ़रेब-ए-मशीय्यत समझूँ
इस कदर 'अपना' हो कर भी तू मेरा नहीं

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