Salik Ganvir   (© सालिक गणवीर)
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Joined 9 November 2018


Joined 9 November 2018
Salik Ganvir YESTERDAY AT 17:57

आजकल पास आना नहीं चाहते,
हम भी तो दूर जाना नहीं चाहते।

दिल मिलाना बड़ी दूर की बात है,
हाथ भी वो मिलाना नहीं चाहते।

प्यालियाँ मय की होठों को छूने लगी,
हाथ भी हम लगाना नहीं चाहते।

आशना इतने अब अजनबी हो गए,
मिलके भी मुस्कुराना नहीं चाहते।

घाव ही घाव हैं दिल में अब हर जगह,
चोट हल्की भी खाना नहीं चाहते।

आज तक सिर्फ धोखे ही धोखे मिले,
ख़ुद को अब आजमाना नहीं चाहते।

आख़िरी दौर है हर ख़ता माफ हो,
बात हम भी बढ़ाना नहीं चाहते।

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Salik Ganvir YESTERDAY AT 22:54

अभी अभी तो खुली हैं आंखें अभी अभी तो सहर हुई है,
हमें तो चाहत थी उम्र भर की क्या दोपहर भी न हो सकेगी।

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Salik Ganvir YESTERDAY AT 20:36

ख़ुश बहुत होंगे मेरे हाल पे हंसने वाले,
एक दिन आएगा जब लोग हंसेंगे तुम पर.

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Salik Ganvir 19 JAN AT 12:38

दूर तक है अंधेरा चले आइए,
आ रहा है सवेरा चले आइए।

स्याह चेहरों की ख़ातिर यहाँ बीच में,
रोशनी का है घेरा चले आइए।

यहीं सरज़मीं है यहीं क़ब्र है,
है यहीं अपना डेरा चले आइए।

दूर ही रह गए हमसे पांचों बरस,
अब लगाएंगे फेरा चले आइए।

दश्त में सांप की बांबियाँ हर तरफ,
और तन्हा सपेरा चले आइए।

जाने क्या बच गया था फ़क़ीरों के घर,
आ गया फिर लुटेरा चले आइए।

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Salik Ganvir 18 JAN AT 17:56

अब हमेशा के लिये हम सो गए,
आ नहीं पाएंगे वापस जो गए।

प्यार करने वाले वो कुछ लोग थे,
नफ़रतों के बीज घर में बो गए।

दब गए लेकिन ज़ुबाँ पर उफ़ न थी,
ज़िंदगी का बोझ लेकिन ढो गए।

हिचकियाँ हमको कभी आती नहीं,
हम ख़यालों में उसी के खो गए।

टूट ना जाए कमर इस बोझ से,
आपके एहसान इतने हो गए।

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Salik Ganvir 17 JAN AT 14:29

साथ चल सकता नहीं मुझको ठहर जाने दो,
वक़्त रुकता नहीं तो इसको गुज़र जाने दो।

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Salik Ganvir 17 JAN AT 11:02

कुछ ऐसा भी कर जाए,
ज़िंदा रहकर मर जाए।

बिल उसका तो है ही नहीं,
सांप से कह बाहर जाए।

सड़कें मेरी उसका फुटपाथ,
कौन अब किसके घर जाए।

सुंदर तो है वो लेकिन,
दर्पण देख के डर जाए।

क़त्ल मिरा हो पर उसके,
सीने में ख़ंजर जाए।

पत्थर , शीशों के घर में,
टूटे और बिखर जाए।

इतना रोना है इक दिन,
आंखें उसकी भर जाए।

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Salik Ganvir 16 JAN AT 22:24

घाव तो गहरे हैं लेकिन,
दूर बहुत हैं मरहम से।

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Salik Ganvir 16 JAN AT 21:04

महफिल में कैसे लड़ते,
तन्हाई के आलम से।

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Salik Ganvir 16 JAN AT 20:25

काश कभी ऐसा होता !
ख़ुशियाँ मिलती मातम से

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