Salik Ganvir   (© सालिक गणवीर)
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Joined 9 November 2018


Joined 9 November 2018
Salik Ganvir 4 HOURS AGO

जीने का सामान नहीं है,
मरना भी आसान नहीं है।

झाड़ झरोखे छत है लेकिन,
कमरों में दालान नहीं है।

हक़ था मेरा, छीन लिया है ,
आपका ये एहसान नहीं है।

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Salik Ganvir YESTERDAY AT 14:12

यहाँ नफरतों के निशाँ भी नहीं हैं,
बता प्यार को अब कहाँ पर लुटाऊँ।

सभी दुश्मनों में सुलह हो गई है,
मैं क्यों दोस्तों को गले से लगाऊँ।

یہاں نفرتوں کے نشاں بھی نهیں ہین
بتا پیار کو اب کہاں پر لوٹاؤں
سبھی دشمنوں میں سولہ ھو گئی ہے
میں کیوں دوستوں کو گلے سے لگاؤں

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#banatii ghazal
#ash'aar
#ywdidi #yqbaba #yqbhaijan
122 122 122 122

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Salik Ganvir 11 NOV AT 20:09

उदासी की रूत में जो ख़ुश हो रहा है,
नये दर्द की क्यों फसल बो रहा है।

اداسی کی رٹ میں جو خوش ھو رھا ہے
نیے درد کی کیوں فصل بو رھا ہے

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Salik Ganvir 11 NOV AT 12:27

तमाशा तो ये हो चुका है पुराना,
मदारी नया अब कहाँ से बुलाऊँ।

अचानक ये क्या हो गया आपको भी,
मैं मातम करुँ या मैं ख़ुशियाँ मनाऊँ।

تماشا تو یے ھو چکا ہے پرانا
مداری نیا اب کہاں سے میں بلاؤں
اچانک یے کیا ھو گیا آپکو بھی
میں ماتم کروں یا میں خوشیاں مناؤں

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Salik Ganvir 10 NOV AT 18:45

अंधेरे में इक दिन ये होके रहेगा,
तेरा नूर हो और मैं जगमगाऊँ।

اندھیرے میں ایک دین یے ہوکے رہیگا
تیرا نور ھو اور میں جگمگاؤں

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#banatii ghazal
#she'r
#ywdidi #yqbaba #yqbhaijan
122 122 122 122

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Salik Ganvir 10 NOV AT 12:07

है मुमकिन किसी दिन तुझे भूल जाऊँ,
मैं यादों को कैसे ठिकाने लगाऊँ।

ہے ممکیں کیسی دین تجھے بھول جاؤں
میں یادوں کو کیسے ٹھکانے لگاؤں

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Salik Ganvir 9 NOV AT 12:57

ख़िजां का मौसम बहार होता,
तुम्हें अगर हमसे प्यार होता।

हमें भी मिलता क़रार थोड़ा,
ज़रा सा तू बेक़रार होता।

कभी न झुकती कमर हमारी,
न इतना कांधों पे भार होता।

उन्हीं के आगे जो मौत आती,
तभी उन्हें एतबार होता।

सबक़ न आये जिसे वफ़ा के,
पढ़ा- लिखा भी गंवार होता।

क़फस में बैठा ये सोचता हूँ,
कभी तो क़ातिल शिकार होता।

ख़ुशी ज़रा तो है ज़िन्दगी में,
वगरना ग़म बेशुमार हो ता।

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Salik Ganvir 8 NOV AT 10:52

ख़िजां का मौसम बहार होता,
तुम्हें अगर हमसे प्यार होता।

हमें भी मिलता क़रार थोड़ा,
ज़रा सा तू बेक़रार होता।

कभी न झुकती कमर हमारी,
न इतना कांधों पे भार होता।

उन्हीं के आगे जो मौत आती,
तभी उन्हें एतबार होता।

सबक़ न आये जिसे वफ़ा के,
पढ़ा- लिखा भी गंवार होता।

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Salik Ganvir 7 NOV AT 15:08

ख़िजां का मौसम बहार होता,
तुम्हें अगर हमसे प्यार होता।

हमें भी मिलता क़रार थोड़ा,
ज़रा सा तू बेक़रार होता।

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#बनती ग़ज़ल

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Salik Ganvir 7 NOV AT 12:07

ये खारा जल समंदर का कहीं बदला नहीं जाता,
किसी प्यासे के होठों तक कोई झरना नहीं जाता।

सभी तो जानते हैं कि वही है जड़ मुसीबत की,
उखाड़ा ही नहीं जाता, जिसे फेंका नहीं जाता।

जहाँ तक हो सके चल दो, भले हो पांव में छाले,
सफ़र लंबा हो तो रस्ते में यूं बैठा नहीं जाता।

अगर उड़ता है उड़ने दो इसे भी आसमानों में,
ये ख़्वाबों का परिंदा है ,इसे पकड़ा नहीं जाता।

सभी तो भागते दिखते हैं जीवन में मुझे हर दिन,
चलो, जब तक कि माथे पर पसीना आ नहीं जाता।

वहाँ तन्हा ही जाना है सभी को एक दिन यारो,
मैं चाहूँ भी तो संग मेरे वहाँ साया नहीं जाता।

--©--सालिक गणवीर



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