Sachin Dhingra   (Heart.Listener)
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● Maitrika is my fictional love 😉🙈
●inspiration from random sources
Joined 5 November 2016


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Sachin Dhingra 9 MAR AT 11:00

कुछ बातें है जो अधूरी है,
पर ख़ैर छोड़ उन्हें पूरा करना भी कौन सा जरूरी हैं।

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Sachin Dhingra 10 NOV 2019 AT 18:27

अपनी इस कहानी में मैं तुझसा क्यों बन बैठा,
खुदका जो था मेरा, वो बयां क्यों ना हो सका।
दुआ करी थी जो पाने की,
उसे क्यों पीछे छोड़ आया हूँ।
की नए रास्तो की ख़ोज में निकला हूँ,
पुराने रास्तो से रिश्ता क्यों तोड़ आया हुँ।

ख़ोज में निकला हूँ मैं खुदकी,
ख़ुदको ढूंढ के ही अब वापस आऊंगा।
उन उनकाही बातो का हिसाब,
फिर किसी और दिन चुकाऊंगा।

क़िताब रखी है मैंने हाथ में,
अपने सारे जज़्बात इसी में छिपाऊँगा।
जो ना मिला कभी मैं,
तो मेरी इस क़िताब को पढ़ लेना।
कही मिलू या ना मिलू मैं,
अपने अल्फाज़ो में जरूर मिल जाऊँगा।
जो अगर खो भी गया मैं,
तो भी इन अल्फ़ाज़ों में अपनी दुनियां छिपाऊँगा।

लिखता हूँ वो आखिरी अल्फ़ाज़,
जो जाने से पहले तुझे बताना बाकी है।
दुआ मांगी है तेरे नाम की,
अब बस तेरा मुस्कुराना बाकी है।

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Sachin Dhingra 15 SEP 2019 AT 12:27

हवां का दस्तूर है बहते जाने का,
शायद इसलिए ये आज तक आज़ाद है।
वार्ना लोग पानी भी कैद कर लेते है बोतल में,
लोगो के जज्बातों की तो बात ही खैर अलग है।

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Sachin Dhingra 9 SEP 2019 AT 0:21

अंधेरे का शोर है,
यही चारो और है।
चाहे रात में भी अब उजाला है,
पर यहाँ तो सबका मन ही काला है।
इस समझदारों की दुनियां में,
झूट का ही बोल-बाला है।
रुपया से दुनियां बिकती है,
और दुनियां को ना कोई संभालने वला है।

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Sachin Dhingra 7 SEP 2019 AT 14:07

बचपन याद आता है जब यादों की गुल्लक में हम खुशियां बटोरते थे,
चिल्लड़ सी है ये खुशियां सस्ते में मिल जाती है।
पर अब जिंदगी की अलग कहानी है,
यादों की गुल्लक की जगह शोहरत का बटुआ लिए घूमती है।
और ये तो दुनियां भी जानती है,
बटुए में कभी ज्यादा देर तक चिल्लड़ रुकती नही।

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Sachin Dhingra 10 AUG 2019 AT 13:26

मैं लफ़्ज़ों में कहने चला था,
जो बस जज़्बातोँ से बयान हुआ था।
मैं वो जंग लड़ने चला था,
जिसका अभी ऐलान ही नही हुआ था।

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Sachin Dhingra 10 AUG 2019 AT 13:17

लोग वाह-वाह करते है,
और हम अपने ख़्वाबों के दरियां में डूब जाते है।
कोई तो हाथ थाम के बाहर निकाल ले,
दो पल चैन की सास लेने का मन करता है।

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Sachin Dhingra 6 AUG 2019 AT 17:46

डोरियों में बंधने से पहले,
कुछ धागों की पहचान होती।
काश जिंदगी में उलझने से पहले,
मुझे मेरे खवाबों की पहचान होती।

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Sachin Dhingra 6 AUG 2019 AT 17:40

जिंदगी की पहेली में कुछ यूं उलझ गए,
जो बंधे थे तरसे धागे वो खुदबा ख़ुद सुलझ गए।
सोचा था किसी दिन उन धागों को मिलके सुलझाएंगे,
तुम कहो तो एक बार फिर उन्हें उलझा दे क्या?

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Sachin Dhingra 13 JUL 2019 AT 0:28

आज मैंने अपनी कलम से तेरा जिक्र किया,
उसने भी तेरी कई कहानियां सुना दी।
लोगो से जो छुपाई थी,
वो सारी बातें बता दी।

दो पल का साथ था हमारा,
लेकिन हम खुल के मुस्कुराये थे।
अब जो बिछड़ रहे, तो ये केसा रोना है?
बिछड़ना भी जरूरी है, तो अफ़सोस क्यों होना है।

माना लकीरो को पढ़ना नही आता मुझे,
शायद उन्हें बदल भी नही पाऊंगा।
पर हर अपने पे हक़ जाता के,
उन्हें ना तड़पाउंगा।

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