सागर बृजवासी  
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Joined 18 April 2018


Joined 18 April 2018

ये भार किस्मत का था,या मेरा
मैं सियासी पालने में पलती हूँ
तूने कहा था,आत्मनिर्भर बनो
देख अपने दम पर चलती हूँ ।

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जब दुख ज्यादा हो तो आर्ट से...
और जब गुस्सा हो तो लिखने से...
ही सुकून मिलता है,
यही योग अपने को आता है ।

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मैंने हर खौफनाक मंजर देखा है
दिल कमजोर हो तो शरीर भी बंजर देखा है,
तूने शेर कहा होगा खुद को,देखकर पिंजरे में
मैंने दुश्मन की आंखों में चलता अपना खंजर देखा है।

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शब्द नहीं थे मुख में जब
हर जुबां समझती थी माँ,
अब शब्दों से कहानी लिख दो
हर मर्म समझती है माँ ।

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रुतवा तुझसे,हर अक्स तुझसे माँ
सांसे तुझसे,हर नक्स तुझसे माँ
तेरी हथेली भी गाल पर चादर लगती
तेरी गोद स्वर्ग है,ईश्वर का स्वर्ग भी तुझसे माँ ।

हैप्पी मदर्स डे "माँ"💐

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न तू आँधी सी पसन्द है,
न सीतल बरसात से इश्क़ होगा
आँधी तबाह करेगी मुझे...
बरसात का दीवाना हर आशिक़ होगा ।

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चूमा कीजिये सुबह उठकर इस धरती को
तुम्हारे कदमों को सिर्फ इसी का सहारा है ।

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ये रक्त बना न कर्ज़ में
मेरा इश्क़ रहा है फ़र्ज में
इस माटी पर अर्पण स्वीकारा है
रहे सीस तिरंगे की अर्ज में ।

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मेरा कद एक विचार है
विकसित संस्कृति आधार है,
है ज्ञान ही धर्म मेरा जग में
ये कुटुम्ब ही सब संसार है ।

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हमें दर्द रहा कि तुम अपने थे
तुम अपने ही तो सपने थे,
मनसूबों से कहानी लिखी तुमने
वरना हमें कहाँ इश्क़ जपने थे ।

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