S. Mitra   (S.Mitra)
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A student
Passionate writer
Music lover
An ambitious person
Joined 3 June 2019


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22 JUL 2024 AT 0:48

हर बात मे तुम ।
बेहिसाब भी तुम हो, साथ भी तुम हो।
ख़ामोश भी तुम हो, आवाज़ भी तुम हो।
ख़्वाहिश भी तुम हो, जज़्बात भी तुम हो।

अंजाम भी तुम हो, आगाज़ भी तुम हो।
आकाश भी तुम हो, और काश भी तुम हो।
खलिश भी तुम हो, और साज़ भी तुम हो।
हमराज़ भी तुम हो, आवाज़ भी तुम हो।
दर्द भी तुम हो, एहसास भी तुम हो।
मैं छुपाता हूँ जिसे,
वो राज़ भी तुम हो।

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11 FEB 2022 AT 5:37

खुद पर ऐतबार कभी किया नहींं,
करते रहे हम इंतज़ार मगर,
खुद से प्यार कभी किया नहींं।
ख़ामोश पलकों को थी ज़रूरत ख़्वाबों की,
उन्हें वो हक़ कभी दिया नही।
जिसे कहते थे ख़्वाब, वो ज़रुरतें थी अपनों की,
हमने ज़िन्दगी को कभी जिया नहीं।

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5 FEB 2022 AT 2:10

हमने सहर का इंतेज़ार छोड़ दिया।
तुम तो तुम थे, हमने खुद पे ऐतबार छोड़ दिया।
कश्मकश थी की क्या है ज़िंदगानी मेरी।
कोई ना समझा के हमने जीना छोड़ दिया।
सब देखो मेरे होंठों की नकली मुस्कुराहट को,
हमने सफ़र में नज़र आना छोड़ दिया।
अब तो बैठतें हैं यादों की तन्हाइयों में,
के लगता है किस्मत ने मरहम लगाना छोड़ दिया,
और तुम तो छोड़ चले हमें इस ज़माने में तन्हां,
तुम्हें शायद ये नहींं पता, के अब हमने ये ज़माना छोड़ दिया।
अब तो इतना रुला चुकी हैं तेरी यादें इस दिल को,
की अश्कों ने इन पलकों पे आना छोड़ दिया।
काश तुझे ये इल्म होता के कितना चाहते थे तुझको,
की अब तेरे बिना भीड़ में नज़र आना छोड़ दिया।

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5 FEB 2022 AT 1:43

खुद तो सजती नहींं मगर, इस घर को सजाती हुँ।
क्यूंकी हर कोने में मैं, तेरी झलक पाती हूँ।
वो जो तू कहता था अधूरा हूँ मैं तेरे बिना,
बार बार उन लफ्ज़ो को कानों से लगाती हूँ।
खुद तो सजती नहीं मगर, इस घर को सजाती हूँ।
ये बारिश भी बईमान है तेरी तरह,
हर बार भिगो कर आने का इंतेज़ार दे जाती है,
फिर भी यादों की बूंदों को सीने से लगाती हूँ।
खुद तो सजती नहींं मगर, इस घर को सजाती हूँ।
ये पर्दे ये देहलीज़ ये चादर है तेरे इंतेज़ार का,
घर का कोना कोना तेरी खुशबूओं से महकाती हूँ।
तू तो आया नहींं मगर, खुद को तेरे सिरहाने छोड़ आती हूँ।
कोई पूछे जो मंदिर का रस्ता है किस तरफ़ मेरे घर का,
बड़ी संजीदगी से तेरी तस्वीर दिखाती हूँ।
खुद तो सजती नहीं मगर, तेरे लिए घर को सजाती हूँ।
कुछ वादों की ज़रूरत है कुछ ख्वाबों की ज़रूरत है,
घर तो सज गया मगर, रातों के लिए तेरी ज़रूरत है।
हर बार दिल में एक ख्वाहिश लिए चुप चाप सो जाती हूँ।
तू कभी तो आयेगा ये कह कर, इस दिल को बहलाती हूँ।
खुद तो सजती नहीं मगर, इस घर को सजाती हूँ।
खुद तो सजती नहीं मगर, इस घर को सजाती हूँ।

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4 FEB 2022 AT 1:21

नशा तो है बस तेरा,
यूँ ही शराब को बदनाम किया हमने।
विसाल-ए-यार तो है बस तेरा,
खामखाँ ही शहर को रुसवाह किया हमने।
कश्मकश है कि तेरी जुदाई, जाने किस मोड़ पे लायी हैं।
कभी लगे कड़वी सी, कभी आंसुओं की परछाई है।

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12 JAN 2022 AT 23:32

हैरत में हैं कि जी रहें हैं अब भी,
इतने ज़ख़्म हैं की सी रहें हैं अब भी।
दिल जैसे है छिला हुआ,
आंसुओं को पी रहें हैं अब भी।
कोई जैसे चाबुक चलाता हो हम पे,
की चीख़ रहें हैं अब भी।
जिसके लिए जी जातें हैं हर बार,
क्या वो देखता होगा?
उसकी ख़्वाहिशों के सदके,
उसके बिना जी रहें हैं अब भी।

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11 JAN 2022 AT 0:18

तुम ना देखो तो क्या हुआ।
हम तो जान वार चुके,
तुम ना रहो तो क्या हुआ,
हम तो दिल यार हार चुके।
कश्ती थी जो समंदर के बीच में,
हम तो यार घर आ चुके।
यूँ हुआ जो नशा तेरे इसतक़बाल का,
हम तो दुनिया हार चुके।
काश तुम्हें जूनू ए महोब्बत हो हम से,
हम तो सोज़ ए वफ़ा मांग चुके।
यूं ही रहेगी ये बाज़ी उम्र भर,
हम तो जन्नत से खुदा मांग चुके।

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19 AUG 2021 AT 19:21


फिर भी ख्वाहिशें पूरी होने का ख्वाब सजाये रखा है।
हमने तो ख़्वाबों को दिये सा जलाये रखा है।
हर बार अपने दिल को तोड़ा है हमने,
हर बार उन टुकड़ों को जोड़ा है हमने,
हमने तो उन टुकड़ों को सीने से लगाए रखा है।
इस दिल को अपनी चाहों में,
अहमक सा बनाये रखा है।

उम्मींद तो नहीं है फिर भी,
खुद को मुस्कुराहटों में छुपाए रखा है।
हमने तो एक समंदर आँखों में बसाये रखा है।
हमने तो एक समंदर आँख़ों में बसाये रखा है।

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19 AUG 2021 AT 13:05

आइने में पड़ी धूल सी, धुंधली है ये सहर,
मै रास्तों से पूछता फिरू, मेरा पता क्या है?
वो जो क़रीब आते आते दूर नज़र आतें हैं,
उन ख्वाहिशों से पूछता हूँ उन्हें हुआ क्या है?
ढूंढता हूँ जिसे हर प्रेहर हर शहर,
वो जो दिखें कहीं उनसे पूछना, मेरी ख़ता क्या है?
ख़त्म तो नहीं, अभी थोड़ा बाकी हूँ,
ढूंढता हूँ खुद में, बाकी और बचा क्या है?
कभी जो हो बारिश, बूँदों से भर लेता हूँ हथेली अपनी,
के धुल जाये तो नज़र आये इनमें लिखा क्या है?
काश जो निकलूँ कभी घर से,
कोई तो ये पूछे, ये आज तुम्हें हुआ क्या है?
ये आज तुम्हें हुआ क्या है?

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19 JUL 2021 AT 1:16

ऐ दिल चल तुझे एक काम दिया जाए,
उसकी यादों से सजा दे ये ज़िन्दगी,
चल इस ज़िन्दगी को उसके नाम किया जाए।
दिमाग से नहीं, ये काम सिर्फ दिल से होगा,
चलो इस दिमाग को ज़रा आराम दिया जाए।
वो केह के गये हैं, तुम नहीं जानते इश्क़ करना,
चलो उनके नाम से इस सुबह को शाम किया जाए।
बस एक आख़री है मौका जो तुझे देते हैं,
वरना क्या इस दिल को बार बार लगाया जाए!

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