रसोई के खिड़की से बाहर ,दिख रहा था आसमान
कुछ बादल उमड़ते घुमड़ते,उनके बीच टिमटिमाते तारों का ज़हान।
कुछ देर पहले बारिश हुई थी,
मिट्टी से सोंधी खुशबू तैर रही थी
बैठा अपने कमरे में, मैं
अकेलेपन से बातें कर रहा था,
इस मौसम में एक चाय मिल जाय
तो बस मजा ही आ जाये ये सोच रहा था।
तब कहीं दूर से एक आवाज आयी
आज भी तुम उतने ही आलसी हो
जब तक न दूँ चाय बिल्कुल नहीं हिलते हो,
नहीं हूं साथ तो क्या हुआ
जाओ रसोई में जो पतीले पे चाय चढ़ाओ।
जरा अपनी नजर रसोई की खिड़की से बाहर तो फिराओ ।
मैं गया रसोई बनाने चाय ,वही नजारा बाहर दिखा,
वही उमड़ते घुमड़ते बादल ,और तारे टिमटिमाते,
जैसा उसने कहा था ,
सोचने लगा अरे कैसे उसे सब पता था
तभी एक झोंका हवा सा आया ,
लगा दुप्पट्टा कोई लहराया और मेरे चेहरे को छूता हुआ,
दूर कहीं चला गया
वो अहसास कितना खास था
अब मैं चाय और मेरा अकेलापन नहीं
वो अहसास मेरे साथ था ।
जैसा उसने कहा था ।- © rUPESh
29 JUN 2025 AT 21:00