Rohit Singh Thakur   (Shayar-e-udgir)
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Joined 1 October 2017


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22 FEB AT 14:12

कांटों जैसे लोग।

बिना कांटों के
कहां फूल मिलेंगे।

चाहे जितना चाह लो
ये नही खिलेंगे।

जितने ज्यादा कांटे
उतनी ज्यादा खुशबू होगी।

ये बात है सीधी
पर हर कोई कहां समझेंगे।

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22 FEB AT 0:49

किसी दोस्त ने उपहार लाया।
किसिने साथ तस्वीर खिचायी।

जो सब से क़रीबी दोस्त था।
उसने बस “भाई” आवाज़ लगायी।

सब छोड़-छाड कर मैंने
उसकी ओर दौड़ लगायी।

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21 FEB AT 22:43

बहुत तन्हाई है ज़िंदगी में मेरे।
समेट कर अपने चूल्लु में भरली मैंने।

फिर चाहा छिड़कना
गली, मुहल्ले, चौराहे में इसे।

इतना प्यार था हमसे उसे,
कमबख़्त क़मीज़ पर गिर वापस आ गयी घर में।

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21 FEB AT 20:05

जो सुनना नहीं था हमें।

कह दिया बड़ी आसानी से
की अब मिलना नहीं हमें।

करते भी क्या, ना मान कर बात
शायद चाहा ही ना हो उन्होंने हमें।

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21 FEB AT 19:53

बहुत दूर निकल आए हैं।

प्यार, इश्क़ की दुनिया से
हर नाता तोड़ आए हैं।

नहीं जाना फिर उन गलियों में।
जहाँ अपना एक हिस्सा जला आए हैं।

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21 FEB AT 19:47

बोल दो के अब चुप रहना रास ना आ रहा।
कल जो चुप था वो आज ना नज़र आ रहा।

लबों से ना कहो ना सही, आँखों से कहना।
हमको आँखे पढ़ने का नया हुनर है आ रहा।

वाजिब ये बात है की हर किसी की बस कि नही।
इससे निकलने का कोई और रास्ता ना नज़र आ रहा।

तोड़ दो चुप्पी और कह भी दो ना ‘प्यार है तुमसे’।
दिल इसके अलावा कुछ सुनना ना चाह रहा।

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18 FEB AT 18:09

गुनहगारों को यहाँ मसीहा बताया जाता है
अबला, लाचार का गला दबा दिया जाता है।

चमकते है बन के सितारे ये भेड़िए
इन्हें बढ़ावा देके तय्यार किया जाता है।

बना देने चाहिए मक़बरे इनके
शहज़ादा मान पलकों पे बिठाया जाता है।

अक्सर मरता है एक हिस्सा मेरे अंदर
जब-जब इन्हें मान खुदा पूजा जाता है।

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17 FEB AT 14:37

मायने इश्क़ के बदल गए है।
इश्क़ करने वाले बचे नहीं है।

करके वादे तोड़ जाते है।
‘निरोध’ लिए है 'गुलाब' नहीं है।

तन की आग इश्क़ नहीं है।
परिभाषा ये पढ़े ही नहीं है।

मन का मान इश्क़ है।
भावनाओं का सम्मान है।

दिल को दिल से जोड़े है।
हवस का इसमें उल्लेख नहीं है।

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15 FEB AT 15:34

जो लोग अपनी संगत में
बहुत गैर-ज़िम्मेदाराना हरकतें देखते हैं।

वो रौंद देते है अपनी ज़िम्मेदारियों को
अपने क्रूर व्यवहार से।

और फिर कोसते है परिस्थितयों को
इंसानों को, अपने परिवार को।

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13 FEB AT 15:15

दूर-दूर से मुसाफिरों को
मंज़िलो तक पहुंचाती है।

कितनी बदनसीब होती है
वो रेल की पटरियां।

खुद इतने करीब होकर भी
मिल नही पाती है।

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