Rohit Singh Thakur   (Shayar-e-udgir)
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Joined 1 October 2017


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Joined 1 October 2017
YESTERDAY AT 10:57

ना शोक मना पा रहा है।
ना मातम मना पा रहा है।

जीते जी जो घर से जा रहा है।
मर कर भी वापस ना आ रहा है।

आख़री दीदार को उनके तरस गए।
कफ़न भी उनको नसीब ना हो रहा है।

इंसान इतना गिर चुका है।
मरे हुए का कफ़न भी चुरा रहा है।

ना जाने क्या होगा मेरे इस महान देश का?
कोई मज़े कर रहा है और कोई और सज़ा पा रहा है।

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9 MAY AT 16:53

क्यूँ लिखूँ मैं आज ही अपनी माँ के लिए।
उसने तो मेरी ज़िंदगी की कहानी लिखी है।

हर किसी को सिखाता हूँ मैं मायने ज़िंदगी के
उसिसे तो मैंने ज़िंदगी जीनी सिखी है।

क्या होगा दो पंक्तियाँ लिख कर उसपे
मेरे क़िस्सों से भरि किताबें उसके ज़हन में छपी है।

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6 MAY AT 11:49

अमीर मज़े कर रहा है
छुट्टियाँ मनाने विदेश जा रहा है।

जिनको मान बैठे थे हीरो हम
विडीओ बना कर पैसे कमा रहा है।

जिनको मुड कर भी नहीं देखा हमने कभी
वो असली हीरो अस्पताल में जान बचा रहा है।

आम आदमी छान रहा है धूल रास्तों की
ढूँढता है पलंग अस्पताल में, अपने खो रहा है।

खाँसता है तो गला छू लेता है।
डर कर अपना पारा देखता है।

सुबह शाम बस “करोना” ना हो जाए
यही ख़ौफ़ में पल-पल मरता है।

फ़िक्र उसको नहीं है
अपनी बिलकुल भी।

बाद उसके परिवार का क्या होगा,
ये ख़याल उसे मारता है।

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1 MAY AT 14:38

ख़ूबसूरत जर्द फूल हो तुम
सुर्ख़ होटों की लाली हूँ मैं।

छम-छम करता पाज़ेब हो तुम
कानों में सजी बाली हूँ मैं।

मेरा बेश-बहा ज़ेवर हो तुम
लोग कहते हैं गाली हूँ मैं।

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26 APR AT 23:31

कर रहे हो मेजवानियाँ
मना रहे हो जलसे।

रो रहे है डॉक्टर अस्पताल में
तुम्हें उससे क्या करना?

ना ही गुज़रा है कोई यार तुम्हारा
ना कोई अपना।

करो ख़ूब मनमानी
जश्न मनाओ सुबह-ओ-शाम।

ना मानना तुम आसानी से
मानना लेकर किसी अपने की जान।

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24 APR AT 17:32

उम्मीद!


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20 APR AT 21:16

फ़ासले भले ही कम हो दरमियाँ,
दिलों के बीच दूरियाँ बढ़ जाती है।

अजीब होते है ये रिश्तों के धागे भी,
ज़्यादा खींच जाते है तो, टूट जाते हैं।

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13 APR AT 2:21

दिलजले शहर छोड़ देते है
किसी अपने को भुलाने के लिए।

हम बेशर्म है ज़रा, जा बस्ते है वहीं
उनकी एक झलक से दिन बनाने के लिए।

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13 APR AT 0:39

जो रूठ जाओगी तुम बेमतलब
मैं तुम्हें ना मनाऊँगा।

मान कर के तुम हो मशगूल
मैं चुप ही रह जाऊँगा।

देखूँगा फिर कुछ दिन और
क्या ग़ुस्सा तुम्हारा नाप पाऊँगा?

जो बढ़ जाय उलझन्न बेमौसम
मैं हार अपनी मान जाऊँगा।

रख कर सर कंधों पर तुम्हारे
मैं आँखें मूँद सो जाऊँगा।

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12 APR AT 18:06

Don’t try to catch
my hand when I’m allowing
you to hold my finger.

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