Rohit Singh Thakur   (Shayar-e-udgir)
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Joined 1 October 2017


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Joined 1 October 2017
Rohit Singh Thakur 5 JUL AT 15:37

लड़की से औरत
बन जाती है।

जब एक मां बच्चे को
जन्म देती है।

एक नया
जन्म पाती है।

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Rohit Singh Thakur 4 JUL AT 18:50

मैं मानना चाहता हूं सिम्पल तुमको
ना जाने क्यूं तुम स्पेशल बन जाती हो।

मैं करना चाहता हूं डिलीट हमारी सारी मेमोरीज को।
जाने कैसे दिमाग के रिसाइकिल बिन में रह जाती हो।

छोड़ दिया है आना दर पर तुम्हारे
फिर भी जहन-ओ-दिल पे छाई हो।

अब तो एक ही इल्तज़ा है मेरी तुझसे "रोहित"
भले वो पुकारे जितना लौट कर आवाज़ नहीं लगानी है।

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Rohit Singh Thakur 4 JUL AT 16:48

जिस किसे ने कहा है

दिखाई ना देने वाला ज़ख़्म ज़्यादा दर्द देता है।
ज़रूर उसने प्रेशर कूकर खोलते वक़त भाप खाई होगी।

जैसे मैंने आज खाई। 😒☹️🥺

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Rohit Singh Thakur 1 JUL AT 12:59

I will say “Hi”
I will definitely “Try”

If you want me to “Beg”
I would rather say “Bye”

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Rohit Singh Thakur 29 JUN AT 10:31

यक़ीं मानो,
कुछ नहीं होता एक हाथ से।

यहाँ तक कि
ताली भी दो हाथ से बजती है।

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Rohit Singh Thakur 28 JUN AT 13:42

लम्हें

यादें पीछा नहीं छोड़ती

बिछड़ जाते है लोग

एक हिस्सा अपना
साथ ले जाते हैं

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Rohit Singh Thakur 28 JUN AT 12:50

दोस्तों के दोस्त को यार मानना होशियारी हो सकती है।
पर दोस्तों के दुश्मन को दुश्मन मानना तो बेवक़ूफ़ी है।

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Rohit Singh Thakur 27 JUN AT 23:40

जब छोड़-छाड के सारे कांड पीछे,
ज़िंदगी में हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

कुछ लोग समझने लगते है ग़लत इसे,
ग़लतफ़ैमि का शिकार हो जाते हैं।

जो शीशे को पटकोगे बार-बार तुम
आजाती है दरारें, टुकड़े हज़ार हो जाते हैं।

जब हो जाता है चकनाचुर वो
लाख चाहने पर भी दर्पण नहीं देख पाते हैं।

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Rohit Singh Thakur 27 JUN AT 14:23

बस ऊँचाई पर पहुँचना ही सब कुछ नहीं
साथ अपने “अपनों” का भी होना ज़रूरी होता है।

सूरज से सीखिए कुछ ज़रा
इतनी दूर रहके भी पृथ्वी से वफ़ादारी नहीं छोड़ता है।

पंछियों से सीखिए कुछ ज़रा
कोई छूट जाता है पीछे, सारा क़ाफ़िला रुक जाता है।

कहने को तो बहुत कुछ कह देते है लोग
जब “निभाने” की बात होती है, दिखाई कोई नहीं देता है।

ज़्यादा की उम्मीद में, अपना आज बिगाड़ रहे है लोग
“रोहित” तू इंसान बने रहना, “अमीर” बन सबकुछ नहीं मिलता है।

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Rohit Singh Thakur 24 JUN AT 8:41

दिल में हमारे अजब ये ख़याल आया है।
ख़ुदको मुसाफ़िर तुमको रास्ता पाया है।

चलते थे आगे हमेशा दौड़-ए-ज़िंदगी में।
आज ख़ुदको सबसे पीछे हमने पाया है।

तेरी रहमतो से ही जी है हमने ये ज़िंदगी।
बिन तेरे साए के एक पल ना कट पाया है।

बन बैठे हैं कई सिकंदर मान तुझको छोटा।
तेरी लाठी के मार से कहाँ कोई बच पाया है।

...इस जीवन से बस यही सिख ले “रोहित”।
उनसे जो टकराया है,कभी न खड़ा हो पाया है।

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