क्या मेरे दिए झुमके अब भी कानों में सजाती हो,
क्या अब भी माथे पे बिंदियां और होठो पे लाली लगा कर आईने के सामने इतराती हो...
क्या अब भी रातो में मेरे अल्फ़ाज़ों को पढ़कर मुस्कुराती हो,
क्या अब भी कोई हीर और राँझा की दास्तां तुम है सुनाता है...
क्या अब भी तुम सुबह की सुनेहरी धूप सी होती हो,
या रात की चाँद सी चाँदनी बिखरेती हो...
क्या अब भी तुम अपने हाथो पे मेहदी लगाती हो,
ये सावन वाला है शादी वाला इससे बेहतर होगा किसी को कहकर जलाती हो...
क्या अब भी में तुम्हारे ख्यालों में आता हूँ,
तुम्हारे संग देखे हर सपने को उस सपने में सच कर जाता हूँ...
क्या अब भी कोई मेरा नाम लेकर तुम है चिढ़ाता है,
एक लड़का तुम्हारे लिए दीवाना था कोई तुम है बताता है...
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तुम पे भी दो तीन डायरिया लिखता हूँ...😌❤️
तू वादियों सी खूबसूरत...
में गंगा सा ठहराओ हूँ,
तू हिमाचल की हूर,
में बिहार का लाल हूँ...
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कुंदन की तरह किसी ज़ोया के लिए नही मरना है...
राज की तरह मोहब्बत पे फ़तेह करना है...❤️-
वीर और ज़ारा की फिर से सौगात लिखा दूं,
मोहब्बत में आज एक ऐसा इतिहास लिख दूं हिन्द और पाक को एक साथ लिख दूं...-
में अल्फ़ाज़ लिखूं, तुम नज़्म कहलाना।
में फूल लिखूं, तुम गुलाब बन जाना
में इबादत लिखूं, तुम ख्वाब बन जाना।
में पहाड़ लिखूं, तुम वादिया कहलाना
में जिस्म लिखूं, तुम रूह बन जाना।
में गीत लिखूं, तुम प्रीत कहलाना
में प्रेम लिखूं, तुम दिल से निभाना।
में गंगा घाट लिखूं, तुम सुकून बन जाना
में जब कुछ भी न लिखूं, तब भी तुम सिर्फ मेरी
कहलाना।
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चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ, जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए
मैं नींदों में तेरे ख़्वाब पढ़ूँ, तेरे ख़्वाबों से मुझे नींद आए”-
तुम मेरे घर के सामने रहती तो
इतना गजब हो जाता, की
दो छत की दूरी से मुझे चाँद नज़र आता...-
तुमने गलती की है मुझे पता है...
अगर में भी वही गलती करू तो तेरे और मेरे बीच मे फर्क किया है।
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माँ
मैंने दर्द देखा है उसकी आँखों मे पर वो जताती नही,
बोहोत हिम्म्त वाली है वो पर वो किसी को बताती नही।-
क़ुदरत की तुम खूबसूरत सी रचना हो...👰
किताबों में लिखी परियो की कहानी जैसी एक कल्पना हो,
तुम है पाने की कोशिश में लगा हूँ...
थोड़ा मेरा इंतजार करना
बस किसी भी मजनू के साथ गठबंधन में मत बंधाना।
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