Ranju Jaiswal   (Ranju jaiswal)
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Joined 13 February 2018


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Joined 13 February 2018
Ranju Jaiswal 18 AUG AT 20:44

खामोशी उधर भी है खामोशी इधर भी है
टूटकर बिखरने की आवाज़ फिर ये कैसी है

वो कह गया न आवाज़ दूंगा मैं कभी
इंतज़ार में ठहरी हुई निगाहें फिर ये कैसी है

है खबर वो कदम न आएंगे इधर फिर कभी
हर आहट पर चौंकती धड़कन फिर ये कैसी है

कहते हैं मोहब्बत में सुकूं है दो जहां का
दिन रात सताती मुझे बैचेनी फिर ये कैसी है

हर ज़ख्म पर सोचा मिलेगा अब मरहम मुझे
हर बार मिलता ज़ख्म है बदनसीबी ये कैसी है

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Ranju Jaiswal 4 AUG AT 17:40

रूबरू खुद से होने का मन करता है
तो कदम दोस्तों की गलियों में पड़ते हैं
बोझ ग़म का भारी जब लगता है
हाथ दोस्तों का बांटने उसे लगते है
कभी देते हैं साथ बनकर वो साया
कभी रोने को कंधा अपना वो देते हैं
फटे हुए जख्मों पर पैबंद लगाते हैं
सूखे लबों को मुस्कान से खिलाते हैं
शब्द नहीं खामोशी वो पहचानते हैं
क्या हुआ तुझे इस बात से जताते हैं
लहू से बढ़कर प्रीत अपनी निभाते हैं
हां दोस्त बड़भागे के हिस्से ही आते हैं।

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Ranju Jaiswal 19 JUL AT 8:00

मेरी ये संवेदनाएं
मेरी ये भावनाएं
मेरे हृदय का प्रेम
प्रेम...जो मैंने तुम्हें दिया
उन्हें संभाले रखना
अपने मन की किसी कोठरी में
या फिर हृदय के किसी संदूक में
गर न संजो पाओ उन्हें
तो बहा देना नदी की धारा में
कर देना विसर्जन मेरे प्रेम का
किंतु न कहना किसी को
न खोलना पोटली मेरे प्रेम की
कभी किसी के सामने
क्योंकि ये प्रेम
कहां किसी को समझ आता है

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Ranju Jaiswal 12 JUL AT 19:44

जीवन की ये मरीचिका है भी या नहीं
कहीं उम्र भर ये पिपासा यूं ही न बनी रहे
और दौड़ते रहे हम निरन्तर
चिरकाल तक
मृत्युपर्यन्त तक
फिर हो जाएं समाप्त
बिना किए रसपान इस जीवन माधुरी का
भटकते रहे बस इसी मरीचिका के पीछे
और वो अमृत जलाशय छूट जाए ,
रह जाए अछूता हमसे
जिसे सब मोक्ष कहते हैं।

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Ranju Jaiswal 4 JUL AT 1:01

मुझे तुम मेहसूस होते हो
जब ये सूखी गर्म हवा
कुछ नम हो जाती है
और भर जाती है नमी
इन आंखों में स्वतः ही
जब ये मन कुछ उदास होता है
सहसा फिर स्वयं ही खिल उठता है
और तरेर जाती है
एक मुस्कान मेरे इन अधरों पर
जब ये शरीर शिथिल पड़ा होता है
तभी छूकर मेरे इस तन को
एक झोंका हवा का गुज़रता है
और सिहर सी उठती हूं मैं
जैसे छुआ हो तुमने
हां तुम मुझे तब बहुत मेहसूस होते हो।

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Ranju Jaiswal 15 JUN AT 16:49

टूट जाती हूं जब ज़र्रा ज़र्रा
बिखर जाती हूं कोने कोने
बहा देती हूं अश्रुधारा
हो जाती हूं जब हताश
देता है मुझे कोई
मेरे भीतर से आवाज़
यही जीवन है
यही जीवनपथ है
तू व्यर्थ क्यों करती है विलाप
समेट उन टुकड़ों को
सहेज फिर खुद को
कर संचार साहस का
उठा हर भार जीवन का
उस अंधेरी कोठरी के हर कोने से
मैं ढूंढंती हूं अपने बिखरे टुकड़े
गढ़ती हूं फिर से खुद को,
लाती हूं बाहर
हाथ स्वयं का थामकर
जहां प्रकाशमान है सब
मैं पुनः प्रकाशित होती हूं
इस तरह मैं टूटती हूं
टूटकर फिर संवरती हूं
जीवनपथ पर चलती हूं।

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Ranju Jaiswal 2 JUN AT 23:37

अर्धांगिनी नहीं मैं श्याम की
प्रीत मेरी किस काम की
न संग रहूं, न संग चलूं
न भोर जगाऊं ,न रात मनाऊं
श्रृंगार मेरा न प्रीतम देखे
अश्रुवेग न मेरा वो पोछें
मैं खीझूं तो न मुझे मनाए
न बाहों का मुझे हार पहनाए
पीड़ा मेरे हिय की,मेरे हिय में रहे
न कभी उसे शब्द मिले
न कोई गूंज उसकी सुने
सुनो रुकमणी तुम बड़भागी
तुम्हें श्याम पल में मिले
मेरा जीवन बीत रहा
बस श्याम की बाट जोहते।

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Ranju Jaiswal 28 MAY AT 10:06

युगों से सहेजती,संजोती आ रही है न
सभ्यता का हिस्सा नहीं
पूरी सभ्यता है ये गंगा
ढोती आ रही है
निर्मल जलधारा को
बुझाती आ रही है प्यास
और सींच रही है जीवन
फिर क्यों सूख रही है ये
क्यों जीवनदायिनी जीवन को तरस रही
क्यों ये सीमित हो रही
मां है न ये,फिर क्यों तिरस्कृत हो रही
अच्छा है;वैसे भी कहां मां को संजोना आता है हमें

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Ranju Jaiswal 21 MAY AT 19:47

तुम्हीं हो न
हृदय के इन पन्नों पर अंकित
फिर क्यों नहीं
शब्दबद्ध हो पाते हो मुझसे
क्यों जब भी स्याही भरती हूं
तुम्हें लिखने को
कम ही पड़ती है वो स्याही
पढ़ती तो हूं तुम्हें रोज़ थोड़ा
फिर क्यों लगता है
अभी बहुत शेष है पढ़ने को
सुनो तुम ही बता दो न
क्या लिखूं
कैसे तुम्हें शब्दों में गढूं


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Ranju Jaiswal 3 MAY AT 20:54

ऐ दिल यूं टूट कर बिखरना ठीक नहीं,
टूटे सामान की होती कोई औकात नहीं,

हर बार बताया तुझे यूं हक जताया न कर,
वो हंसकर बात करते हैं और कोई बात नहीं,

तेरी नादानी की कीमत कब तक चुकाएं,
बहुत गरीब हैं हम,कोई जागीरदार नहीं,

ज़माने में अक्सर लोग मिलते हैं राहों में,
हर कोई साथ निभाए ये तो कोई बात नहीं,

जो ज़ख्म हैं दिल के उसे सबसे छुपाए रख,
ये बाजार है नमक का, मरहम की दुकान नहीं।

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