Ranju Jaiswal   (Ranju jaiswal)
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Joined 13 February 2018


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Ranju Jaiswal 21 MAY AT 19:47

तुम्हीं हो न
हृदय के इन पन्नों पर अंकित
फिर क्यों नहीं
शब्दबद्ध हो पाते हो मुझसे
क्यों जब भी स्याही भरती हूं
तुम्हें लिखने को
कम ही पड़ती है वो स्याही
पढ़ती तो हूं तुम्हें रोज़ थोड़ा
फिर क्यों लगता है
अभी बहुत शेष है पढ़ने को
सुनो तुम ही बता दो न
क्या लिखूं
कैसे तुम्हें शब्दों में गढूं


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Ranju Jaiswal 3 MAY AT 20:54

ऐ दिल यूं टूट कर बिखरना ठीक नहीं,
टूटे सामान की होती कोई औकात नहीं,

हर बार बताया तुझे यूं हक जताया न कर,
वो हंसकर बात करते हैं और कोई बात नहीं,

तेरी नादानी की कीमत कब तक चुकाएं,
बहुत गरीब हैं हम,कोई जागीरदार नहीं,

ज़माने में अक्सर लोग मिलते हैं राहों में,
हर कोई साथ निभाए ये तो कोई बात नहीं,

जो ज़ख्म हैं दिल के उसे सबसे छुपाए रख,
ये बाजार है नमक का, मरहम की दुकान नहीं।

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Ranju Jaiswal 21 APR AT 16:26


वो बट गया धर्म में किंतु देश धर्म निरपेक्ष चाहिए,
वो बेच आया वोट अपना,उसे नेता ईमानदार चाहिए

नैतिकता का हुआ पतन चलो अब मैं भी नेता हुआ
इस देश में कहां किसी को नैतिकता वाला नेता चाहिए

देश पर मर मिटने को अब कहां कोई तैयार होता है,
हर एक की यही तमन्ना अब देश बर्बाद होना चाहिए

अखण्ड भारत का सपना हुआ करता था कभी,
अब हर नेता को अलग अपना एक देश चाहिए

आतंकी नेतृत्व भी मंजूर है,गर मुफ्त में सबकुछ मिले,
मुफ्तखोरी की लत हमें हर कर्ज माफ़ होना चाहिए


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Ranju Jaiswal 13 APR AT 16:16

राम राम हर कोय कहे, राम बने ना कोय
हर कोय जो राम बने, कलयुग काहे होय ।

भक्ति नवधा भई भली, दीनी सब बिसराय
शोर मचाय कीर्तन करे, संत्संग दीनी भुलाय ।

प्रेम शब्द कियो संकीर्ण, मीठे बेर न भाय
दो नैन कियो सीमित, पाठ दियो बिसराय ।

रामनवमी की धूम है, रावणों के बीच
सीख तेरी तज दियो, दिवस रहे सब सींच ।

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Ranju Jaiswal 8 APR AT 7:37


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Ranju Jaiswal 6 APR AT 0:31

बसने की चाहत है तुममें,
चाहे जिस रूप में हो...
संगिनी,बंदिनी, प्रियसी
जो रूप तुम्हें भाए...
जीवन के अंतिम क्षण तक,
तुममें ही समाहित होकर रहना है,
शायद उसके बाद भी...
जिस तरह शिव से सती पृथक नहीं हुई,
ज्वाला में ज्वलित होकर भी,
शिव के समीप रही,
बस वैसे ही राख होने के बाद भी....
तुममें ही बसे रहना है...
ताकि मेरी ये प्रेम की क्षुधा बुझती रहे,
और तुम्हारे प्रेम का अमृत कलश...
मुझपर छलकित होता रहे...
युगों तक,जब तक प्रेम है..
या फिर जबतक मेरा कोई चिन्ह शेष है।

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Ranju Jaiswal 29 MAR AT 20:06

उस सूख चुकी बांस की झुरमुटों की तरह,
दिल की ख्वाहिशों का समूह भी तो सूख गया है,
फिर क्यों नहीं विसर्जित कर देती हूं इन ख्वाहिशों को,
क्यों इनका अस्थि कलश लिए घूम रही हूं,
और मांग रही हूं कुछ स्नेह की बूंदें,
जो करदे हरा मेरी मृत ख्वाहिशों को,
नहीं, अब और नहीं छलना है स्वयं को,
कूच करना है अकेले ही दुनियां से,
फिर क्यों हथेली पर कोई स्पर्श चाहिए,
मन मेरे तू स्थिर हो जा, और चल गंगा किनारे,
बहा दे इन मरी हुई ख्वाहिशों की अस्थियों को,
और उन्मुख हो जा चिर एकाकीपन की ओर।

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Ranju Jaiswal 18 MAR AT 9:59

ये बाहर का कोलाहल,
ये चारों तरफ की हलचल,
क्यों नहीं हरते हृदय का एकाकीपन,
क्यों नहीं भर पाते उस शून्य स्थल को,
जो कालांतर से हृदय में बसा है,
क्यों असफल हो जाती हैं सभी आवाज़,
टकराकर उस नरम दीवार से,
जो चाहता है एक स्नेही स्पर्श,
और वो शख्स जो खोल दे सभी गिरह,
घोल दे रस प्रेम की मिश्री का,
और हरले उस एकाकीपन को,
भर दे उस शून्यता को,
जींवत कर दे इस शिथिलता को।

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Ranju Jaiswal 13 MAR AT 13:37

रिश्ते कुछ चुपचाप निभ जाते हैं,
और कुछ चुपचाप बिखर जाते हैं,
कुछ बन जाते हैं केकट्स से कंटीले,
न देते हैं छाया,न प्राणदायिनी वायु,
बस चुभते हैं,और बहा देते हैं लहू की बूंदे,
जब भी हाथ बढ़ा उन्हें छूने की करो कोशिश,
सोचती हूं अच्छा है, कुछ दूर रहूं इनसे,
न चुभेगीं, न बूंद लहू की बेवजह गिरेंगी,
हां एक सूनापन निरन्तर रहेगा ,
किंतु मन में बेवजह की खलल न रहेगी।

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Ranju Jaiswal 6 MAR AT 13:13

वो नज़र में सबकी बस एक कतरा था,
जो आंखों से मेरी निकला था,
बहा ले गया संग जज़्बात गहरे,
और ले गया संग मेरे दर्द घनेरे,
शोर को दबा चुपचाप वो बहा था,
कैसे कहूं वो महज़ बूंद आंसू का था,

कितने दर्द समेट रखे थे,
कितनी भर रखी थी आहें,
सभी शब्द बटोर रखे थे ,
जो होठों से न निकले थे,
वो मेरे सभी हालात ले निकला था,
कैसे कहूं वो महज़ बूंद आंसू का था।

तेरी हर बात की चुभन थी उसमें,
तेरी दी हुई हर चोट के निशां थे,
वो प्रेम जो घायल पड़ा हृदय में,
उस प्रेम के लहुलुहान चिथड़े थे,
मेरी विवशता का वो परिचायक था,
कैसे कहूं वो महज़ बूंद आंसू का था।

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