Rajni Singh   (Rajani ki rachnaye)
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Joined 7 October 2017


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Joined 7 October 2017
Rajni Singh 15 AUG AT 22:31

कभी कभी माँ - बाप समझाकर या डांट कर भी जो एकता स्थापित नहीं कर पाते हैं कुटुम्ब में।
वही कुटुम्ब के मुखिया के छीजते जाने का डर सबको एकता सूत्र में बांधकर मोती की माला सा बन पाठ पढ़ा जाती है कुटुम्ब में।
इसे ही आस्था और विश्वास कहते हैं जो स्वार्थ से परे अच्छे कर्मों का फल दिला ही जाती है परिवार को एक रक्षासूत्र में बांधकर खुशियों की सौगात बाँट जाती है कुटुम्ब में।
रजनी अजीत सिंह 15.8.2019
🇹🇯पन्द्रह अगस्त 🇹🇯और रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Rajni Singh 11 AUG AT 22:21

जिंदगी में किसी भी रिश्ते को इतना हद से ज्यादा प्यार न करो।
की अगले को उस प्यार का एहसास न हो तो टूट कर बिखर जाने का भी वजह न हो।
जिंदगी कट जाती है साहब, टूट कर चाहने के बाद भी, और टूट के बिखर जाने के बाद भी।
दोनों की स्थिति एक ही जो है कभी अपार खुशी का एहसास, कभी अत्यधिक गम का एहसास।
रजनी अजीत सिंह 11.8.2019

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Rajni Singh 9 AUG AT 22:58

रिश्तों में समुंदर के जैसे गहराई रखना साहब,
नदियां खुद बखुद मिलने आयेंगी।
रजनी अजीत सिंह 9.8.2019
शुभ रात्रि

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Rajni Singh 9 AUG AT 22:52

खामोश रहकर कोई मिटा रहा है हमको।
शायद अपने जैसा बना रहा है हमको।।
रजनी अजीत सिंह 9.8.2019

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Rajni Singh 9 AUG AT 22:46

कुछ कहा न मुझसे मगर वो कभी न भूलाने वाला प्यार बेहिसाब दे गया।
देखो ना मुझ जैसे नासमझ को खुद को लिखने के लिए प्यार का एहसास दे गया।
रजनी अजीत सिंह 9.8.2019

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Rajni Singh 7 AUG AT 20:49

चलो हर गम को भुलाया जाये,
चलो खुद के गम को खुशी से भेंट लिया जाये।
बहुत तड़प चुके सुख के पल के लिए।
बहुत हो चुकी दुनियादारी, चलो कुछ अपने लिये जिया जाये।
चलो दुःख में खुशीयाँ मनाते हैं क्या पता जलस में दुःख खुद हारकर भाग जाये।
रजनी अजीत सिंह 7.8.2019(8.45)

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Rajni Singh 7 AUG AT 14:51

कितनी आसानी से सब कुछ भुलाकर तुम सो जाते हो।
मेरे सपनों को तोड़कर अपने खुशियों में खो जाते हो।
कभी कोशिश भी नहीं करते इस दीदी की आँखों में झाँककर अंतर्मन को देखने की।
महसूस कर मेरे आँखों में आँसू तुम अनदेखा सा कर जाते हो।
कितनी आसानी से सबकुछ भुलाकर तुम सो जाते हो।
तुम्हारे लिए मैं गैर हरदम थी और गैर हूँ और गैर रहूँगी।
पर तुम मेरे मन में हमेशा के लिए अपनो में शामिल हो और सदा के लिए अपना ही रहोगे।
मुझे झुकाकर तुम इतना तन जाते हो, कभी मैं तन जाऊँ तो पता है क्या होगा?
भाई - बहन के पवित्र रिश्ते जो धर्म और जाति से परे है उसे भी झूठा साबित कर दोगे।
भाई होने का अधिकार न जताकर यदि तुम्हें खुशी मिलती है तो मिलने दो पर बहन को कुछ फर्ज और कर्तव्य बताकर जीने के लिए कुछ तो वजह दे जाते।
कितनी आसानी से सब कुछ भुलाकर तुम सो जाते हो।
मेरे सपनों को तोड़कर अपने खुशियों में खो जाते हो।
रजनी अजीत सिंह 6.8.2019



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Rajni Singh 6 AUG AT 22:50

"भाई"



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Rajni Singh 6 AUG AT 18:47

शब्दों से गुणगान करूँ तुम्हारी तो सूरज को दीपक दिखाने जैसी बात हो जाये।
मन की आँखों से देखूँ तो तारीफ में बहुत कुछ कहने को जी चाहता है पर कुछ कह न पातें है....
शब्द आते हैं और लिखने से पहले ही खो जाते हैं।
फिर ये सोचकर दिल घबरा जाये की हमारी मित्रता पर किसी की नजर न लग जाये।
रजनी अजीत सिंह 6.8.2019

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Dedicating a #testimonial to DEEP THINKER

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Rajni Singh 4 AUG AT 18:08

क्यों न मित्रता में वफादारी का इनाम दिया जाय, नाम ही देना है तो क्यों न गहन विचारक के साथ मित्रता से भी बढ़कर जिगरी दोस्त होने का इनाम दिया जाय।
यह मेरी ख्वाहिश है तो फिर आपको इन्कार क्यों है?दोस्ती मुझसे है तो मेरे दर्द के एहसास से दूरी क्यों है?
मित्रता कहने पर मित्र की बात समझे वो सच्ची मित्रता का एहसास कहाँ है?
मित्रता तो वो दवा और दुंआ है की मरते को भी जिला दे।
मैंने थोड़ी सी मन की बात कही तो तेरे नाराजगी का मुझे मन में एहसास होता है?
एक उम्र बीत गयी हमें अच्छे मित्र की तलाश करने में, अब इस मित्रता को क्या खाना - ब - दोशी का नाम दिया जाय।
गले मिलने तो आपस में हर मित्र रोज आतें है, मगर मुफलिसी में जो साथ निभाये वही जिगरी दोस्त के नाम से नवाजा जाय।
अभी रोशन है मित्रता में चाहत के दिये हमारी आँखों में,
बुझाने के खातिर मित्रता के एहसास की लौ को पागल हवायें रोज आयेंगी।
ये सच है कि तेरे नाराजगी के शब्दों ने हृदय में आग लगा दिया, कहना कुछ चाही थी, शब्दों ने तुम्हें कुछ और समझा दिया।
कच्ची डोर से बँधी हमारी मित्रता नहीं जो टूट जाय, यदि एहसास की डोर से जुड़ी है तो उम्मीद की ठंडी हवायें रोज आयेंगी।
रजनी अजीत सिंह 4.8.2019

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