Rajni Dhankhar Dangi   (Rajni Dhankhar Dangi)
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Joined 14 August 2020


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Joined 14 August 2020
17 OCT AT 18:56

निखरती हैं...
कुछ उम्मीदें बस...
खुली हवा में...
बंद कमरों में ...
अक्सर अँधेरा ...
फैल जाता है।

-


12 SEP AT 8:11

सुलझती नहीं...
कभी कुछ ...
उलझनें...
पर जीने का...
सलीका ...
सीखा जाती हैं।

-


22 AUG AT 18:13

उलझी हुई सी...
इस कहानी में...
सुलझी हुई सी...
शामिल हूँ मैं।

-


1 AUG AT 7:43

जिक्र...
क्यों करना...
अपनी बंदिशों का...
जब ऊपर ...
उड़ान के लिए...
तुम्हारी सोच ही काफी है।

-


17 JUL AT 21:44

गुजर ही ...
जाते हैं...
वो लम्हे...
हक जिन...
पर हमारा ...
नहीं होता।

-


26 JUN AT 21:23

ना उठती हैं कभी...
ना झुकती हैं कभी...
कुछ नजरें तो बस...
नजरों में झाँकती हैं।

-


1 JUN AT 18:40

छोड़ दिया...
जब दामन...
हर सहारे ने मेरा...
उम्मीद की लौ...
इन आँखों में...
मैंने फिर भी...
जलाए रखी।

-


13 MAY AT 7:18

गुजर...
जाती हूँ ...
देखकर ...
जिसे हर रोज,
मुलाकात की...
बारी अब उन...
आँखो के ...
सपनों से है।

-


1 MAY AT 7:19

जीतना है अब...
उन अँधेरों को...
जो कदमों को मेरे...
जाने से रोकते हैं...
रोशनी की ओर।

-


16 APR AT 20:50

जुगनुओं सी...
चमकती हैं...
खुशबुओं सी...
महकती हैं...
नहीं बुझती ...
कुछ उम्मीदें तेज...
आँधियों में भी।

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