पुलकित प्रकाश मुख पर लेकर। हम चले रवि को प्रभा देकर।
कर में ले कलम की आग प्रखर। आए रचने इतिहास अमर।
हम कौन थे, भले हमें याद नहीं। क्या होंगे, बेशक ज्ञात नहीं।
किन्तु यथार्थ यह अपना है, जो बीत चुका वह सपना है।
जो आज को अपना कहते हैं। कल वही सुखी रहा करते हैं।
पग जल में जो धरा करते हैं, वो ही नदिया से तरते हैं।
हमने समस्याएं देखीं है सब, बाधा उखाड़ फेंकी हैं सब।
जग में है नाम किया अपना, जग को बलिदान दिया अपना।
फिर क्यों बिफरें हालातों से? फिर क्यों बिखरें परेशानी में?
गर हार गए तो भी क्या ग़म? हम क्यों जीतें बेईमानी से?
अपनी तो यही पहचान रही। ज़िन्दगी ईमान का नाम रही।
जो ग़लत, उसे हम ग़लत कहें। जो सच है वही बस लगा सही।- ©रजत द्विवेदी
15 JUN 2019 AT 16:26