Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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9 HOURS AGO

जो जी रहे हैं, उन्हें जीने का मकसद नहीं मालूम।
जो फना हो गए, उन सबका कोई अपना मकाम था।

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YESTERDAY AT 7:45

दिल को छेड़ जाती है।
आस चाहत की फ़िर
हमसे जुड़ जाती है।
हम तलाश रहे होते हैं जिसको,
सहसा हमें मिल जाता है।
लगता है फिर कि जैसे
ज़िंदगी मुकम्मल हो जाती है।

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23 SEP AT 22:45

कालिंदी का तट हो या कि अवधपुरी का उपवन।
काशी की गंगा की गोद या मगधभूमि का चंदन।
कितने ही कारण मिले मुझे, बदला स्वरूप है क्षण क्षण।
मैं जन्मा हर युग में बनकर क्रान्ति का लघु कण।

खड्ग, धनु, पुस्तक, माला, या कि दवात और कलम।
सभी प्रतीकों से शोभित है रहा सदा मेरा जन्म।
मैंने थामा है युग युग को, बनकर प्रगति का कारण।
मुझसे ही तो है चमक रहा अंबर-अवनि का आंगन।

जितनी भी बार गिरूंगा मैं, उतनी ही बार उठूंगा।
जितनी भी बार मरूंगा मैं, उतने अवतार धरूंगा।
मेरे वजूद को नहीं बांध सकता है मरण का बंधन।
मेरी कृतियां जीवित रहेंगी, बनकर समाज का दर्पण।

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23 SEP AT 22:12

सच है एक दिन सबका रूठ जाना तुमसे।
बीच राह में सबका साथ छूट जाना तुमसे।

करीब होकर भी, दूर हो जाना तुमसे।
दिल का रिश्ता तोड़ जाना तुमसे।

मगर क्यों कोई ऐसा है जो हर दफा याद तुम्हें आयेगा।
आँखों का ख़्वाब, या कि दिल में एक टीस बनकर
तुम्हें सदा तड़पायेगा।

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23 SEP AT 8:05

श्वेत पुष्प लेकर मुझसे, तुम करो प्रेम स्वीकार, प्रिये।
सहल रहेगा मेरा यूं तुमसे करना इज़हार, प्रिये।
मुझे नहीं पसंद लगाना अतिशयोक्ति का अंबार, प्रिये।
यह प्रेम ही है, कोई जंग नहीं, क्या जीत और क्या हार, प्रिये।

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22 SEP AT 21:15

जिनकी ख़ुद की कोई कहानी नहीं होती,
वो औरों की कहानियों में ख़ुद को ढूंढा करते हैं।
ख़ुद को उनमें ढ़ालते हैं, उनमें जिया करते हैं।
सच है, खुद की कहानी का ना होना,
कितना दुखद होता है।
औरों का किरदार निभा, ख़ुद का वजूद खोता है।

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21 SEP AT 22:04

मैं कब से तेरी राह देखूं।
इस ओर, उस ओर, हर ओर तकूं।
ख़ामोशी में भी तेरी आहट सुनूं।
तू आकर मुझे थाम ले कभी।
मुझे ख़ुद से ही बांध ले कभी।

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21 SEP AT 7:56

भोर उजली सी ख़ुद में समेटे रही कहानियां हज़ार।
हमने सुबह को ही मगर माना किस्सों का उपहार।

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20 SEP AT 20:58

जिन आँखों ने देखे सपने, वो ही दुःख से बोझिल थे।
सपने पूरे हुए नहीं पर, आंसुओं से नहीं झिलमिल थे।
ठहर गया था पानी, पलकों को न भिंगोकर रखते थे।
किसी दृश्य पर ठिठक गए, जैसे किसी पत्थर से।

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19 SEP AT 22:50

दीवारें गायब कर दूं।
मकां को शहर कर दूं।
कुछ दूर से आती है सबा ऐसी
जी चाहे कि, एक कमरे में
आज सारी दुनिया भर दूं।
प्रीत की सभी दिशाओं को एकाग्र करके
आज भटके हुए इस दिल को नया एक घर दूं।

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