Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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19 NOV AT 19:47

मैं तुमसे अब नहीं मिलना चाहता
किसी हवा की तरह जो बस छूकर गुज़र जाए।
मैं तुमसे जुड़ जाना चाहता हूं ऐसे कि जैसे
देह ध्वस्त हो जाए जब भी प्राण निकले।

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19 NOV AT 19:33

जिस पल सुख का जुनून होना चाहिए,
उस पल दुःख का संशय घेरे हुए है।
मैं आने वाले सौभाग्य की कल्पना में
भय का साया महसूस कर पाता हूं।
मुझे इंतज़ार है कि यह कुहासा छटेगा
और मैं देख पाऊंगा अपनी स्वछंद
संपूर्ण सुखों की सांझ!

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8 NOV AT 20:27

अब कुछ ख्याल लिखने को आते ही नहीं,
जबसे तुममें डूबे हैं, जज़्बात दिल में समाते नहीं।
तुम ख्यालों से भी परे जीवन की सच्चाई हो,
तुम्हें छोड़कर अब कुछ भी ख़्वाब रास आते नहीं।

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2 NOV AT 13:08

बड़ी पुरानी।
दिल का उबाल, आँखों का पानी।
प्रेम, त्याग, तपस्या, विरह की
लिखती रही अनुपम निशानी।
अपनों की दास्तां रही हो,
या कोई थी नज़्म बेगानी।
युद्ध का कोई वीर गान हो,
या कोई कविता रूमानी।
अपनी अपनी सी लगती है,
कभी कभी लगती अंजानी।

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27 OCT AT 18:21

सब कुछ जीतकर आया, सब कुछ हार जाने के लिए।
सब कुछ हारकर ही सीखा है हुनर जीत पाने के लिए।

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25 OCT AT 11:51

एक बार किसी के प्यार में पड़ कर,
उससे बाहर निकलना इतना दुष्कर है,
जैसे देह से स्वास का अवसान।

मैं तुम्हें चाहकर खुद ब खुद
ऐसे ही तुमसे जुड़ गया हूं।

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25 OCT AT 9:27

मेरे ज़हन को इतना झकझोरता है,
मैं एक दिन में लगता है कि
जैसे कितनी बार मरकर
दोबारा जी उठा हूं।

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23 OCT AT 9:00

इतने जतन के बाद मिले हो तुम
कि हमें अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं होता।
कभी हम तुम्हें देखते हैं,
और कभी ख़ुद पर नज़र फेरते हैं।

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22 OCT AT 15:24

कुछ दिन का अब इंतज़ार और, फ़िर तुम मेरी बाहों में होगी।
ये दिन भले अभी अकेली हों, रातें अब सुकून की पनाहों में होंगी।

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19 OCT AT 0:06

मध्यरात्रि के आसमां तले
हमारा मकां जगमगा रहा है।
हम चांद की रौशनी में बैठे हैं,
या हममें से ही उजाला निकले जा रहा है।

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