Rajat Dwivedi   (रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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Joined 16 November 2017
Rajat Dwivedi 6 HOURS AGO

सीमाएं ज़मीन पर जो हैं उन्हें ना दोष देना इस फ़िराक़ का।
सरहदें ये सोच पर है जिसने एक ही मुल्क को टुकड़ों में बांट रखा है।
भाषाएं, आदतें, रिवाज़ों को अपना दायरा बनाकर,
हमने एक दूसरे को आपस से ही काट रखा है।

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Rajat Dwivedi 8 HOURS AGO

आंखें मूद कर रखोगे अगर तो नज़ारे छूट जायेंगे।
इस सफ़र से जुड़े जो ख़्वाब थे वो हकीक़त से रूठ जायेंगे।

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Rajat Dwivedi 10 HOURS AGO

नए शहर में सुबह जागी है आज कुछ यूं मुस्कुराकर,
जान पड़ गई जैसे ज़िंदगी को नया मुकाम पाकर।

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Rajat Dwivedi 19 HOURS AGO

सफ़र नया, साथी नए, नए उमंग की कहानी है।
ज़िंदगी में चलते रहना ही शायद जीने की निशानी है।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 15:37

स्याही चुक गई।
ख़्वाब ख़त्म हो गए।
तू ज़रूर कोई देवता होगा
जिसका रूप कल्पना के परे है।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 11:13

महव-ए-दुआ में नज़रें झुकाए खड़ा था,
अचानक से जैसे दुआ कुबूल हो गई।
इश्क़ की पुरानी कहानियों का असर हुआ यूं,
आज की हकीकत मेरे लिए अब फ़िज़ूल हो गई।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 7:49

सुबह की चाय जैसे ज़िंदगी का नाम है।
थोड़ी हंसी, थोड़ी सी मोहब्बत का जाम है।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 22:19

भुवन के पार भी कोई भुवन है।
जहां नित नया एक होता सृजन है।
कि जिसके लेख से अंजान हैं हम।
जहां कहते कि कोई भगवान हैं हम।
क्या उस भुवन में सच्ची चेतना है?
या कि ये सिर्फ़ मन की कल्पना है?

नहीं देखा जिसे वह ब्रह्म क्या है?
मनुज है या कि सचमुच देवता है?
जो हम इतना प्रभावित हो रहे हैं।
परे एक कल्पना में खो रहे हैं।
क्या वह संसार भी कुछ सोचता है?
हमें इस पार भी कोई खोजता है?

मनुज की कल्पना का रूप क्या है?
है छांव दिख रही तो धूप क्या है?
बड़ा निर्वाक सा कुछ शोर है यह।
कभी किंचित, कभी घनघोर है यह।
कहो नर देवता को कैसे पाए?
यहां से उस भुवन को कैसे जाए!

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Rajat Dwivedi 23 JAN AT 13:52

अरमानों के जाने कितने फूल झड़ते हैं।
एक सुनहरे वसंत की अभिलाषा में,
किसी की चाहत का इंतज़ार करते हैं।

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Rajat Dwivedi 23 JAN AT 12:08

हादसों भरे शहर में एक और हादसा हो गया।
दिल मासूम था, जाने कहां खो गया।

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