Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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Joined 16 November 2017
Rajat Dwivedi AN HOUR AGO

वह निरंकुश, निश्छल, शुद्ध, तरूणाई।
जिस पर रहती थी अलख अनंत प्रभुताई।
नववृक्षों पर जैसे नवीन कोई किसलय।
उगते सूरज की पुण्य प्रभा के छत्र में।
जो आज उठे तो कल के सूर बन बनेंगे।
अग्नि होंगे या शीतल भरपूर बनेंगे।
अनुराग, भक्ति और ज्ञान के अभिलाषी।
अधरों से सूखे और नयन ज्यों प्यासी।
विकला होती हैं इनकी कोमल आत्माएं।
दुखती हैं अकेलेपन से मस्तिष्क शिराएं।
इन पर भी हांथ फेर कोई तो इन्हें संभालो।
बढ़कर थोड़ा तो इनको भी गले लगालो।
इससे पहले कौमार्य टूट आदमी हो जाएं।
जीवन का बोझा लिए कठोर बन जाएं।
आओ इनको भी स्नेह दान दे दो तुम।
जीवित होने का भी वरदान दे दो तुम।

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Rajat Dwivedi 5 HOURS AGO

हांथ में ले दीप और
नयनों में कुछ उम्मीद सी।
मन में कुछ अवसाद था,
मुख को जो थी सीती रही।
दूर इस तट से निहारा
था क्षितिज के पार तक।
इस भुवन को उस भुवन की
खबर कुछ मिलती नहीं।
हैं कहां वह देव जिसको
इतनी भी दया आई नहीं?
अपने भक्तों की वेदना
क्यों उसे न दिखाई दी?

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Rajat Dwivedi 17 HOURS AGO

क्यों दिल में घर नहीं कर गया वो ख्याल उस वक्त,
जो आज ज़हन को परेशान किए बैठा है।
हम कल गर कोशिश करते करीब होने की,
तो शायद आज फासले नहीं खल रहे होते।

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Rajat Dwivedi 22 HOURS AGO

सब होकर भी सब पास नहीं,
शहर को जाने क्यों जीने की आस नहीं।
कुछ ना होकर भी जैसे सब कुछ है,
गांव हर हाल में दिखाई देता खुश है।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 11:22

तुम अलग थे,
मैं अलग।
तुम अकेले,
मैं अकेला।


तुम अलग हो,
मैं अलग।
तुम जहां संग।
मैं अकेला।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 9:04

खुली किताब सी ज़िंदगी,
जो बांच ले सो मन का मीत कहाय।
औरन को कुछ जो मतलब नहीं,
सो देख आगे बढ़ जाय।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 19:16

एक ख़्वाब से उसकी हकीकत की चाह तक जाता है।
एक उन्माद है जो रह रह कर इस सफ़र में उठ आता है।
हर इक ठोर इसकी राह पर एक नई मंज़िल होती है।
दिल का सफ़र हर पल और हसीन होता जाता है।

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Rajat Dwivedi 5 APR AT 13:05

ग़लत साथी
चलते चलते
दूर तक राही
थोड़ी उलझन
थोड़े सुकून से


खोज लेते हैं।
अपनी चाहत
खोज लेते हैं।
दिल की राहत
खोज लेते हैं।

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Rajat Dwivedi 5 APR AT 9:41

टूटे संगीत बनाकर के।
बिखरे अल्फ़ाज़ सजाकर के।
बिछड़न के गीत सुनाकर के।
बिछड़े को गले लगाकर के।
किस मोह पाश में बांध लिया?
किसके मन को है साध लिया?

अब राहगीर किस राह चले?
क्यों भीतर हिय एक दाह जले?
पत्थर आते हैं पांव तले।
और धूप सघन हो साथ चले।
पर ठोर जो था वो छूट गया।
नयनों से बादल फूट गया।

अब आगे कहां तक जाना है?
किस किस से हांथ छुड़ाना है?
कोई रिश्ता भी निभाना है?
या कि बैरन हो जाना है?
है धनी पथिक जिस स्नेह धन से,
वह रिक्त अब कैसे हो मन से!

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Rajat Dwivedi 4 APR AT 22:58

मगर वो याद अा जाता है।
बहुत कुछ दूर हो जाता है मगर
फिर भी कुछ साथ छूट जाता है।
रात स्याह रहती है मगर,
चांद सुर्ख होता है।
भरी आंखों लेकर कभी जागने वाले,
अब बेमनी नींद सोता है।

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