Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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Joined 16 November 2017
Rajat Dwivedi 4 HOURS AGO

ख्वाहिश थी कि एक रोज़ जहां देखूं।
आख़िर अा देख मैंने किताब खोल ली।
ज़िंदगी में कितने फल्सफे हैं, कितने मुकाम हैं।
किताब ने सहजता से वो सभी बातें बोल दी।

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Rajat Dwivedi 14 HOURS AGO

मानसपटल के अधियाले अंतरिक्ष में,
अनंत विचारों का एक मायाजाल है।
मन की निरंतर चलायमान प्रवृति से,
उठता है एक काला तूफान सा।
जो इस अथाह अंतरिक्ष में
करता है ध्रुवीकरण विचारों का।
दो पाटों में इस तरह बंटकर,
एक स्पंदन से थरथराते हुए
विचार आतिश हो जाते हैं।
इन्हीं शरारों में से सबसे उज्ज्वल,
अकेला चमकता हुआ एक सितारा।
तुम्हारे प्रेम का अनुपम ख़्याल है।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 11:34

रहेगा तुम्हारा इंतज़ार।
आंख बादल से भरे होंगे,
दिल में इश्क बेशुमार।
कोई हद ना होगी अपनी,
मयस्सर रहेगा खुमार।
कभी तो मुकम्मल होगा,
तुम्हारा मेरा प्यार।

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Rajat Dwivedi YESTERDAY AT 7:50

भींगी सड़कों पर फकत चलना बड़ा आसान था।
राह के हर मोड़ पर अपना एक निशान था।

पर मगर जिस रोज़ पत्थर हो गईं सड़कें सभी,
पूछता अब कौन बाकी कब कहां मेरा नाम था!

बादलों को छोड़ते जब देखा मेरा दामन यहां,
हांथ में बाकी नहीं फिर कोई भी अरमान था।

सूखी सड़कों पर नहीं आता कोई संग अब मेरे,
भींगी राहों पर कभी मेरा भी साया तूफान था।

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Rajat Dwivedi 9 JUL AT 22:59

आज फिर देखा अंधेरे में उजाला हो गया।
मां की इक फ़रियाद से विष जीवन प्याला हो गया।

भूख जाने सदियों की थी पेट को चीरती रही,
जैसे अमृत मां के हांथों का निवाला हो गया।

थे सभी दुश्मन मेरे, माज़ी, मुकद्दर और मौत,
देखा जो मां ने उन्हें, मुंह उनका काला हो गया।

मैं रहा दोषी, मलिन, जागा नहीं मेरा ज़मीर,
मां रही पर संग हमेशा, मुझमें उजाला हो गया।

है बड़ी किस्मत मेरी, मां निगेबां करती मेरा,
यह उड़ी जो बात तो जग में बवाला हो गया।

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Rajat Dwivedi 9 JUL AT 12:52

ध्वस्त हो जाती हैं जो इमारतें
आधुनिकता की बुरी हवाओं में,
उन्हें अधिकार नहीं होता सवाल उठाने का,
संस्कारों के अजेय प्राचीन दुर्ग पर!

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Rajat Dwivedi 9 JUL AT 7:53

एक अंधे कुएं को सतह से झांककर देखो।
कभी निगाहों से उसकी गहराई नापकर देखो।
वो जो दूसरे छोर पर हल्की दबी एक सी रौशनी है।
उसे ही व्यथित हृदय में एक उम्मीद कहा जाता है।

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Rajat Dwivedi 8 JUL AT 19:14

आकाश रक्तिम हुआ
इस सांझ बारिश के बाद ऐसे कि,
पूरे दिन रोया होगा बादलों में छिपकर,
सूर्य से बिछड़ जाने के एक ख़्याल से।

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Rajat Dwivedi 8 JUL AT 14:53

मन की धरती पर एक घाव।
कभी रिश्ते कुरेदते हैं उसे,
कभी मरहम बन जाते हैं।
कभी अडिग होती हैं रगबतें,
कभी उखड़ जाते हैं पांव।
रिश्ते हर रंग दिखाते हैं।
अस्ल में ये ही जीना सिखाते हैं।

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Rajat Dwivedi 8 JUL AT 9:20

कितना बदल गए हो।
कितनी पीर सहे हो।
कितना अलग रहे हो।
औरों से कर फासला,
ख़ुद से दूर हुए हो।
कर लो अब वापसी अपनी भी,
दिल के नगर चलो तुम।
प्रेम उपहार स्वीकार करो,
मन को कर लो पावन।

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