Rajat Dwivedi   (©रजत द्विवेदी)
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Joined 16 November 2017


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19 HOURS AGO

जगत की बेहतरीन रचनाएं
कभी एक क्षण में प्रकट नहीं हुईं।
उन्हें वक्त लगा है सोच से सच तक आने में।

तुम मेरी सबसे बेहतरीन कल्पना हो।
वक्त तुम्हें भी ज़रूर लगेगा,
ख्वाबों से हकीकत में तब्दील होने में!

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21 HOURS AGO

मुझे ज़िंदगी का यकीन तो नहीं,
मगर ख़ुद पर ऐतबार है।
तू जो साथ रहने को राज़ी हो,
तो मुझे भी यह इकरार है।
हर दफा, हर क़दम
मैं बस तुम्हारा ही रहूंगा।
सच है कि दिल का मालिक
बस तुम्हें ही कहूंगा।

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16 JAN AT 23:17

रात जितनी गहरी होगी, बात उतनी लम्बी चलेगी।
मगर रात खत्म हो जाती है, और बात का अंत नहीं होता।

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16 JAN AT 21:57

दिन की कहानियां।
रातें अक्सर अल्हदा होती हैं।
तभी तो हम रातों का
कोई भी, कैसा भी
फसाना सोच सकते हैं।

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16 JAN AT 10:06

सब कुछ जीत लेने के बाद भी, सब कुछ हारने की चाह है।
ज़िंदगी जिस भंवर में है, उसमें निराशा भी है, उत्साह है।

क़दम आगे बढ़ते ही नहीं, जबकि सुगम सर्वथा हर राह है।
किसी भय से रुक जा रहे हैं, हमें पग पग की अब परवाह है।

देखते हैं कि हासिल क्या होगा! हमने सब जतन तो कर लिया।
हमारे मन में ज्वार जो उमड़ रहा है, उसकी कोई वजह या सब अन्यथा है?

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14 JAN AT 22:35

कोई हमें आरम्भ में ही मिल जाता है।
कोई अंत तक भी हाथ न आता है।
जीवन में रिश्तों का बनना बिगड़ना,
किसी को समझ न आता है।

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14 JAN AT 21:04

सरकारें आज मुआफ्ज़ा कुछ ख़ास देंगी।
सुना है शहरों को आज नई सांस देंगी।

तुम अपने अपने ह्रदय के छोटे से कोश ले आना।
उम्मीदें बेहिसाब देंगी, नई आवाज़ देंगी।

चुनावों का महीना है, सरकारों को भी जीना है।
तुम ख्वाहिश तो करो भला साथी, तुम्हें परवाज़ देंगी।

मगर बस याद रखना कि यह कुछ दिन का ही मेला है।
भरम मत पाल लेना कि जनम तक साथ देंगी।

अरे! तुम वोट हो, कीमत, तुम्हारी उससे ज़्यादा क्या!
न करना आरज़ू हक़ की, न कुछ तेरे हांथ देंगी।

गनीमत है कि धरती पर अभी तक है बसर तेरा।
जो चाहें ये तो ना फिर कुछ किसी को ख़ाक देंगी।

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14 JAN AT 8:07

दिल में अजब हलचल सी है।
तुम्हें मुलाकात करूं, या दूर से तकूं?
तुमसे दोस्ती करूं, या तुम्हें अपना कह दूं!
मुझे इस नए एहसास की कुछ ख़बर नहीं।

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13 JAN AT 18:41

फ़िर एक दिन होता है यूं,
कि हम उनका इंतज़ार करना छोड़ देते हैं।
जैसे कि सांझ आते ही
सूरज छोड़ देता है उफफ का साथ।
जैसे झट से आ जाती है
उठकर कहीं से गहरी रात।
जैसे हवाओं की लापरवाही से
जल उठे कोई बुझी हुई आग।
आज तक सारी मशक्कत जो की हमने
उन्हें सर्वथा याद रखने में।
एक पल में सब शून्य में लुप्त हो जाती है।

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12 JAN AT 21:58

सबसे मासूम हृदय ही सबसे भीषण आघात सह जाते हैं।
कठोर पाषाणों को यातनाएं सबसे पहले बिखरे देती हैं।

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