25 JUN 2019 AT 23:18

ओ जीवन की अमित कल्पना, ओ माया की सुंदर प्रतिमा।
जग में नहीं है कोई ऐसा, तुझ सम जिसकी हो प्रतिभा।
तू अनुपम, तू सुधामई, तू नैतिकता की है गरिमा।
ख़ुद की तुलना करते सब तुझसे, तुझको दूं किसकी उपमा?

चिंता, आशा, श्रद्धा, शोक, विभोर, ईर्ष्या, और इच्छा।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, माया, जड़ता और विद्या।
हे "कामायनी"! ये सभी तत्व एक तेरा ही तो दर्पण हैं।
मानव का जीवन जिन में बंध बन गया स्वयं एक उलझन है।

तुझ में है दर्पित विवशता मन की, तन की पीड़ाएं अंकित हैं।
तेरी आदतों में जीवन की दुविधाएं सारी चिंहित हैं।
हे "कामायनी"! तू नारी एक मानव का चित्रण करती है।
खालीपन जो है उसका, उसमें प्रकाश तू भरती है।

मानव कितना सरल जटिल है, तुझसे मापा जाता है।
तेरे सभी तत्वों से ही एक मनुज को रूप मिल पाता है।
हे "कामायनी"! तू ही तो आधार है इस सारे जग का।
तेरे रूप की पुण्य विभा से ही संसार है जगमग सा।

- ©रजत द्विवेदी