नाखुदा इस आंधी में पतवार की ना सोच,
डूबना जो तय तो फिर मझधार की ना सोच।
है नहीं किस्मत में शायद साहिल-ए-मकसूद,
बीच दरिया में तू जीत या हार की ना सोच।
यह बहर जो उठ रही है चूमने को अंबर,
घेर लेगी तुझको ऐसे बीच बांह भरकर।
जो अगर तू धंस गया थोड़ा भी घबराकर,
मर चुका होगा तू यूं ही बीच घुट घुटकर।
कल क्या होगा इसका तू कुछ आज में ना सोच,
आज के तूफां से लड़ जा, कुछ बाद की ना सोच।- ©रजत द्विवेदी
15 JUN 2019 AT 19:59