"मिथ्या का भार धरूं किस पर?
शब्दों के वार करूं किस पर?
किस पर घात का आरोप लगाऊं?
छल का मैं प्रयास करूं किस पर?
किस किस को अक्स दिखाऊं मैं?
क्यों ना आईना ही तोड़ जाऊं मैं?
सच सहने का जब बल ही नहीं,
तो कैसे कुछ कह जाऊं मैं? ...."
(पूरी कविता अनुशीर्षक में....)- ©रजत द्विवेदी
19 MAY 2019 AT 23:28