2 OCT 2019 AT 9:46

कितने कष्ट कंटकों में उलझा रहता ये एक प्रसून।
जग की तंद्रालस्य छोड़कर, खिला कहीं विजन में दूर।
जिसकी सरल, कमोलता से रवि भी पिघल जाता है।
नयन नीर को धरती पर जो सावन सा बरसाता है।
ऐसा ही एक मनुज हुआ था भारत की इस धरती पर।
जिसके सहज, सरल जीवन पर प्रमुदित रहा करते थे सब।
छोटा कद और शिथिल शरीर, मगर अनंत प्रतिभाशाली।
जिसने अपनी सरल मुस्कान से सारी दुनिया जीत डाली।
ऐसा प्यारा नेता जग में और कहीं फिर होगा क्या?
ऐसा वीर प्रणेता कोई और कहीं फिर होगा क्या?
"लाल बहादुर" नाम नहीं ऐसे ही इन्होंने पाया है।
कुटिल सियासी खेलों में अपना आदर्श दिखाया है।
भूल रहा क्यों देश आज ऐसे सहजगुण नेता को?
भूल रहा क्यों देश आज इस सरल विश्व विजेता को?

- ©रजत द्विवेदी