8 SEP 2019 AT 23:13

खड़ा है आज नर क्यों खिन्न होकर?
समूचे लोक से यूं भिन्न होकर।
कहीं कुछ बात बदली है यहां क्या?
मनुज की जात बदली है यहां क्या?
क्यों जग से दूर होता जा रहा है?
नहीं क्यों स्नेह सबका पा रहा है?

था उसका दोष बस इतना ही कहना,
नहीं कभी मौन हो अन्याय सहना।
था बल उसमें कि सच को सच कहे वो।
नहीं कभी झूठ की आश्रय गहे वो।
मगर क्या खूब हुआ उपहास उसका।
है दुष्कर अब तो लेना श्वास उसका।

भला जो जग को यूं ललकारता हो।
कलि से लड़ने को उच्चारता हो।
कहां वो चैन से अब जी सकेगा?
कहां जीवन का अमृत पी सकेगा?
उसे तो अब हलाहल पीना होगा।
स्वयं विषधर सा बनकर जीना होगा।

है तपना अब उसे तो राम बनकर,
मनुजता का अटल अभिमान बनकर।
नहीं कोई और पथ बाकी है उसका।
यहां पर कौन अब साथी है उसका?
है जीना अब उसे तो पार्थ बनकर
या मरना कर्ण सा निस्वार्थ बनकर।

- ©रजत द्विवेदी