22 JUL 2019 AT 10:34

जड़ चेतन में भेद नहीं अब, दोनों दिखते एक समान।
शुरू हो गया पतन जगत का, हो कैसे इसका उत्थान?
जड़ ज्यों बिन चेतना के मूड़ मति होता जग में,
अब सचेत मानव भी वैसा ही होता जा रहा जग में।

सविवेक को त्याग चुका नर, औरों के दम पर चलता है।
स्वयं आंक ना सकता सच को, झूठो हामी भरता है।
कठपुतली बन गया समाज का, रोज़ नचाया जाता है।
कितना विवश हो चुका है वह ये भी समझ न पाता है।

हे विधाता, क्यों आख़िर तेरा नर है लाचार यहां?
पग में बांध लिए हैं लोहे, अब जाए तो जाए कहां?
पशु और जड़ की तरह ही मानव भी मतिहीन हुआ।
बुद्धि,बल का स्वामी मानव आज पशुता में लीन हुआ।

सृष्टि के आरम्भ में मात्र में बस मानव को ज्ञान मिला।
चिंतन, मनन, वाचन की शक्ति और स्वाभिमान मिला।
मगर आज वह अन्य पशुओं की भाती को हो रहा है?
आत्मा शायद मर चुकी अब और चेतन सो रहा है।

- ©रजत द्विवेदी