14 OCT 2019 AT 22:15

है नहीं यह वही ठोर जिस पर मैं जलता था।
अवनी की बनती अंगीठी जब मैं चलता था।
पांव पर जब छालों का श्रृंगार होता था।
राह पर नित कांटों का भंडार होता था।
मौसमों में एक अपनी जलन होती थी।
देह में पर ख़ुद-ब-ख़ुद एक गलन होती थी।
छूटता था जो पसीना मुझे भिंगोता था।
मेरे हांथों में बस बहता पानी होता था।

अब मगर क्या हो गया इस ठोर पर आकर?
पांव के नीचे हैं मिलते फूल भर भरकर।
जैसे नियति मुझ पर कोई दया दिखाती है।
मुझको मेरी दुर्बलता का बोध कराती है।
मैं दया का पात्र तो कभी नहीं रह चुका हूं।
हर एक पीड़ा को बहादुरी से मैं सह चुका हूं।
तो क्यों नियति करुणा का मुझे विष पिलाती है?
मुझको अपने सामने क्यों यूं झुकाती है?

- ©रजत द्विवेदी