चिंगारी बन गई लहू की बूंद, धरा मुसकाई थी,
शबनम के भीतर से जब एक आग निकल कर आई थी।
मातृभूमि के लिए एक बेटी ने जान गवाई थी,
अरि दल कांप गए रण में जब लक्ष्मी बाई आई थी।
हांथ खड़ग और तेज सूर्य सा मुख पर लिए आई रानी,
देख विभा उस सिंहनी का रिपु दल हुआ पानी पानी।
रण कौशल ऐसा था जिसको देख पुरुष भी थर्राए,
रण चंडी को भेंट चढ़ाने अरि मुंडों को ले आए।
और लगा दी आग धरा पर नई फसल उगाई थी,
क्रांति बीज में से रानी ने चिंगारी सुलगाई थी।
है स्वदेश ये धन्य आज जो रानी का है उपकार हम पर,
जलती रहेगी उसके नाम से इंकलाब की आग अमर।- ©रजत द्विवेदी
18 JUN 2019 AT 10:09