अंत निकट हो भले मनुज जीवन का,
भय विकट हो भले ढेर होते इस तन का।
लेकिन संबल ना छोड़ो अपने मन का,
दिखलाओ जग को बल अपने जतन का।
अंबर कब केवल बस तम का होता है?
या कि बस केवल चंदा का ही होता है?
जगमग होते हैं अगणित कई सितारे,
कुछ चमके सूर्य से, कई टूटकर हारे।
लेकिन नभ में हर हारा हुआ सितारा,
ध्रुव बनकर फिरता रहता है आवारा।
उसको देखे बिन जग ये कहां चलता है,
गर टूटे तो जग अपनी मुराद करता है।
कब थककर बैठा कभी सूरमा रण में?
बहता है लहू खौलता हुआ कण कण में।
डगमग होते हों भले ही पांव कभी भी,
धीरज खोता है नहीं वो वीर कभी भी।
राही गर कभी हो हार जाए राहों से,
कैसे वो गहेगा मंज़िल अपनी बाहों से।
थककर जो बैठ जाते हैं पंथी जग में,
मिलते हैं उन्हें बस कांटे ही पग पग में।
तुम राही अपनी मंज़िल पर ध्यान लगाओ,
थककर बैठो इससे अच्छा मर जाओ।
आओ जब भी तो ख़ुद उमंग ही लाओ,
जल, थल, अंबर को मंत्रमुग्ध कर जाओ।- ©रजत द्विवेदी
25 APR 2019 AT 23:08